व्यापारिक हित बनाम भू-राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ
भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते के संदर्भ में अमेरिकी आलोचना का विश्लेषण
भूमिका
इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति अब केवल सैन्य गठबंधनों या वैचारिक ध्रुवीकरण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह व्यापार, ऊर्जा और आपूर्ति शृंखलाओं के इर्द-गिर्द पुनर्गठित हो रही है। वर्ष 2026 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच संपन्न मुक्त व्यापार समझौता इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य का प्रतीक है। इसे आर्थिक सहयोग का ऐतिहासिक कदम माना गया, किंतु इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट की तीखी आलोचना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या वैश्विक राजनीति में नैतिक प्रतिबद्धताएँ व्यापारिक हितों के आगे गौण हो चुकी हैं। भारत-ईयू समझौते पर अमेरिका की प्रतिक्रिया वस्तुतः व्यापार, युद्ध और भू-राजनीति के अंतर्संबंधों को उजागर करती है।
भारत–ईयू एफटीए: आर्थिक अवसरों की धुरी
भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता वर्षों की जटिल वार्ताओं के बाद अस्तित्व में आया है। यह समझौता न केवल शुल्क कटौती और बाज़ार पहुँच का माध्यम है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करने की दिशा में भी एक निर्णायक कदम है। ऑटोमोबाइल, वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि-उत्पाद और सेवा क्षेत्र में यह समझौता भारत को यूरोप के उच्च-मूल्य बाज़ार से जोड़ता है।
यूरोपीय संघ के लिए भी यह समझौता रणनीतिक है। अमेरिका-चीन व्यापार तनाव और संरक्षणवादी प्रवृत्तियों के बीच ईयू एशिया में एक स्थिर, लोकतांत्रिक और उभरती अर्थव्यवस्था के साथ दीर्घकालिक साझेदारी चाहता है। इस प्रकार यह समझौता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्संतुलन का प्रयास भी है।
अमेरिकी आलोचना और ऊर्जा राजनीति
स्कॉट बेसेंट की आलोचना का केंद्र बिंदु रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ी ऊर्जा राजनीति है। उनका तर्क है कि भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल का आयात, उसके परिष्कृत उत्पादों का यूरोप को निर्यात, और ईयू द्वारा उन उत्पादों की खरीद—एक ऐसा चक्र बनाते हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से रूस की युद्ध-अर्थव्यवस्था को सहारा देता है। बेसेंट के अनुसार, यह स्थिति यूरोप की घोषित नैतिक प्रतिबद्धताओं के विपरीत है।
अमेरिका ने इसी तर्क के आधार पर भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर दबाव की नीति अपनाई। किंतु यह दृष्टिकोण वैश्विक ऊर्जा बाज़ार की जटिलताओं को सरल नैतिक ढाँचे में बाँधने का प्रयास प्रतीत होता है। ऊर्जा सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की बुनियादी आवश्यकता है, और युद्धकालीन परिस्थितियों में सस्ते व सुलभ संसाधनों की खोज स्वाभाविक है।
नैतिकता बनाम राष्ट्रीय हित: पश्चिमी द्वंद्व
अमेरिकी आलोचना एक व्यापक पश्चिमी द्वंद्व को उजागर करती है। एक ओर लोकतांत्रिक मूल्यों और नियम-आधारित व्यवस्था की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक लाभ और घरेलू आर्थिक हितों के लिए व्यावहारिक समझौते किए जाते हैं। यूरोप द्वारा भारत से परिष्कृत तेल उत्पादों की खरीद इसी यथार्थवाद का उदाहरण है।
इतिहास गवाह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिकता अक्सर चयनात्मक होती है। स्वयं अमेरिका ने भी विभिन्न अवसरों पर प्रतिबंधों में ढील देकर या रणनीतिक सहयोगियों को छूट देकर अपने हित साधे हैं। ऐसे में भारत-ईयू समझौते पर की गई आलोचना नैतिक आग्रह से अधिक रणनीतिक असहजता को दर्शाती है।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-ध्रुवीय दृष्टि
भारत ने रूस-यूक्रेन संघर्ष में स्पष्ट रूप से किसी एक गुट में शामिल होने से परहेज किया है। यह रुख भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति—रणनीतिक स्वायत्तता—का विस्तार है। भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक साझेदारी किसी एक ध्रुव के अधीन नहीं हो सकती।
भारत-ईयू एफटीए इसी बहु-वेक्टर विदेश नीति का उदाहरण है, जहाँ भारत अमेरिका, यूरोप और रूस—तीनों के साथ अपने-अपने संदर्भों में संबंध बनाए रखता है। यह नीति बदलते बहुध्रुवीय विश्व में भारत की परिपक्व कूटनीतिक समझ को दर्शाती है।
निष्कर्ष
स्कॉट बेसेंट की आलोचना दरअसल वैश्विक राजनीति के उस यथार्थ को सामने लाती है, जहाँ व्यापार और भू-राजनीति एक-दूसरे से अलग नहीं रह गए हैं। भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता आर्थिक सहयोग की सफलता है, किंतु यह भी स्पष्ट करता है कि युद्ध, ऊर्जा और नैतिक दावों के बीच संतुलन साधना कितना जटिल है।
अंततः अंतरराष्ट्रीय संबंध न तो पूर्ण नैतिकता से संचालित होते हैं और न ही केवल आर्थिक लाभ से। वे हितों, परिस्थितियों और संवाद के बीच संतुलन की निरंतर प्रक्रिया हैं। भारत जैसे उभरते शक्ति-केंद्र के लिए यह अवसर है कि वह न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व में स्थिरता और सहयोग का सेतु भी बने।
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