Sonam Wangchuk’s Detention and Preventive Laws: Supreme Court Scrutiny of NSA and Democratic Dissent
सोनम वांगचुक की हिरासत: निवारक कानून, लोकतांत्रिक विरोध और संवैधानिक संतुलन
भारत के संवैधानिक लोकतंत्र में निवारक हिरासत हमेशा एक असहज अपवाद रही है—ऐसा अपवाद, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर स्वीकार तो किया गया, लेकिन जिसकी वैधता निरंतर न्यायिक निगरानी पर निर्भर करती है। लद्दाख के सामाजिक-शैक्षिक कार्यकर्ता और जलवायु चिंतक सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत ने इसी असहजता को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं है, बल्कि राज्य की शक्ति, नागरिक अधिकारों, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और संवैधानिक नैतिकता के बीच संतुलन की परीक्षा भी है।
पृष्ठभूमि: लद्दाख की आकांक्षाएँ और आंदोलन
2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को संघ शासित प्रदेश का दर्जा मिला। इसके बाद से ही लद्दाख में दो प्रमुख मांगें उभरकर सामने आईं—
- पूर्ण राज्य का दर्जा, और
- संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण, ताकि आदिवासी पहचान, भूमि और सांस्कृतिक अधिकार सुरक्षित रह सकें।
सोनम वांगचुक इन मांगों के सबसे मुखर और नैतिक चेहरों में रहे हैं। शिक्षा सुधार और सतत विकास के क्षेत्र में उनका योगदान उन्हें एक विश्वसनीय सामाजिक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करता है। ऐसे में 24 सितंबर 2025 को लेह में हुए प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा, जिसमें जान-माल का नुकसान हुआ, एक गंभीर मोड़ साबित हुई।
हिरासत और विवाद का केंद्र
हिंसा के दो दिन बाद, 26 सितंबर 2025 को, वांगचुक को NSA के तहत हिरासत में लिया गया और जोधपुर जेल स्थानांतरित किया गया। यह कदम इसलिए विवादास्पद बना क्योंकि—
- हिरासत का आधार कथित रूप से कुछ वीडियो थे, जिनमें वांगचुक को हिंसा के लिए उकसाने वाला बताया गया।
- लेकिन उसी दिन रिकॉर्ड किया गया एक वीडियो, जिसमें वांगचुक स्पष्ट रूप से हिंसा का विरोध करते हुए शांति की अपील कर रहे थे, हिरासत आदेश में शामिल नहीं किया गया।
यहीं से मामला कानूनी से अधिक संवैधानिक बन जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय में बहस: दुर्भावना बनाम सुरक्षा
8 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हिरासत आदेश पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाया। उनकी दलील का मूल था—दुर्भावना (malice)।
- उन्होंने तर्क दिया कि महत्वपूर्ण साक्ष्य को जानबूझकर दबाया गया, जिससे detaining authority का निर्णय पूर्वाग्रहपूर्ण प्रतीत होता है।
- अनुच्छेद 22(5) के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को शीघ्र आधार बताए जाने और प्रभावी प्रतिवाद का अधिकार है, किंतु यहां आधार 28 दिन की देरी से दिए गए।
- शांति की अपील वाला वीडियो न देना, न केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि हिरासत को असंवैधानिक बना सकता है।
सिब्बल ने गांधीजी के चौरी-चौरा के बाद असहयोग आंदोलन स्थगन का उल्लेख करते हुए कहा कि अहिंसा का आग्रह करना, किसी आंदोलन को अपराधी नहीं बनाता।
राज्य का पक्ष और न्यायालय की भूमिका
राज्य की ओर से यह दावा किया गया कि वांगचुक के बयान उत्तेजक थे और उन्होंने हिंसा के बाद स्थिति संभालने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। किंतु सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने स्पष्ट संकेत दिए कि—
यदि यह सिद्ध होता है कि प्रासंगिक सामग्री को दबाया गया है, तो हिरासत आदेश अपने आप संदिग्ध हो जाएगा।
यह टिप्पणी निवारक हिरासत मामलों में न्यायालय की स्थापित भूमिका को दोहराती है—प्रक्रियात्मक त्रुटि भी हिरासत को अवैध बना सकती है।
व्यापक निहितार्थ: UPSC दृष्टिकोण
UPSC के दृष्टिकोण से यह मामला कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है—
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GS Paper II (संविधान एवं शासन)
- निवारक हिरासत बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 21 और 22 की व्यावहारिक व्याख्या
- संघ-राज्य/संघ शासित प्रदेश संबंध
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GS Paper IV (नैतिकता)
- राज्य शक्ति का नैतिक प्रयोग
- अहिंसक विरोध और नैतिक नेतृत्व
- कानून और न्याय के बीच अंतर
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निबंध
- “राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन”
- “लोकतांत्रिक असहमति: स्थिरता की शत्रु या आधारशिला?”
निष्कर्ष: संवैधानिक नैतिकता की परीक्षा
सोनम वांगचुक की हिरासत का अंतिम निर्णय केवल एक व्यक्ति को राहत देने या न देने तक सीमित नहीं रहेगा। यह इस बात का संकेत होगा कि भारत का संवैधानिक ढांचा असहमति को कैसे देखता है—एक खतरे के रूप में या लोकतंत्र के अनिवार्य तत्व के रूप में।
यदि दुर्भावना सिद्ध होती है, तो यह न केवल NSA जैसे कठोर कानूनों के प्रयोग पर पुनर्विचार का अवसर बनेगा, बल्कि यह भी याद दिलाएगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा संविधान के भीतर रहकर ही संभव है, उसके विरुद्ध जाकर नहीं।
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह सबसे कठिन क्षणों में भी अपने मूल्यों से समझौता न करे।
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