प्रतीक जैन: सत्ता की परछाइयों में काम करने वाला दिमाग
संडे स्पेशल | राजनीति, तकनीक और रणनीति की कहानी
रविवार की सुबह आम तौर पर सुस्त होती है—अख़बार की मोटी परतें, चाय की भाप और राजनीति पर आधी-अधूरी बहसें। पर भारतीय राजनीति के भीतर एक दुनिया ऐसी भी है, जो कभी सुस्त नहीं होती। वहाँ हर दिन आँकड़ों की गिनती होती है, भावनाओं का विश्लेषण होता है और भविष्य की पटकथा लिखी जाती है। उसी दुनिया का एक प्रमुख नाम है—प्रतीक जैन।
प्रतीक जैन उन लोगों में नहीं हैं जो मंच पर दिखें, भाषण दें या पोस्टर पर मुस्कराते नज़र आएँ। वे उन लोगों में हैं जो तय करते हैं कि मंच पर कौन होगा, क्या बोलेगा और किससे कैसे बात करेगा। वे राजनीति के उस चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दिखाई नहीं देता, लेकिन हर जगह असर छोड़ता है।
इंजीनियर से रणनीतिकार तक
रांची में जन्मा एक साधारण-सा लड़का, जिसने IIT बॉम्बे से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, शायद खुद भी यह नहीं जानता था कि वह एक दिन सत्ता की सबसे जटिल चालों का शिल्पकार बनेगा। इंजीनियरिंग ने उसे सिखाया—समस्या को टुकड़ों में तोड़ना, पैटर्न पहचानना और समाधान ढूँढना। यही तरीका बाद में राजनीति में भी काम आया।
कॉर्पोरेट दुनिया में डेलॉइट जैसे संस्थान में काम करते हुए प्रतीक जैन ने जाना कि डेटा केवल नंबर नहीं होता, वह भविष्य की कहानी भी कहता है। फिर वे CAG से होते हुए I-PAC तक पहुँचे—और यहीं से भारतीय राजनीति की एक नई धारा शुरू हुई।
जब चुनाव प्रोजेक्ट बन गए
पहले चुनाव आंदोलन होते थे। अब वे प्रोजेक्ट बन चुके हैं।
हर प्रोजेक्ट में होता है—डाटा, टीम, टाइमलाइन और टार्गेट।
I-PAC ने यही मॉडल राजनीति में उतारा।
किस गाँव में कौन सा मुद्दा चलेगा, किस शहर में किस वर्ग से कैसे बात होगी, किस प्लेटफॉर्म पर कौन सा संदेश जाएगा—यह सब अब “अनुमान” नहीं, “विश्लेषण” से तय होता है। प्रतीक जैन इसी नए युग के प्रतिनिधि हैं, जहाँ राजनीति भी मैनेजमेंट साइंस बनती जा रही है।
वे अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों के साथ काम कर चुके हैं। यह दिखाता है कि I-PAC का मूल मंत्र विचारधारा नहीं, रणनीति है। आलोचक कहते हैं—यह राजनीति का कॉरपोरेटाइजेशन है। समर्थक कहते हैं—यह राजनीति का प्रोफेशनलाइजेशन है।
बंगाल: जहाँ रणनीति सत्ता बनी
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ प्रतीक जैन की भूमिका सबसे ज़्यादा चर्चा में रही।
डिजिटल कैंपेन, आईटी सेल, बूथ मैनेजमेंट, डेटा बेस्ड प्लानिंग—इन सबने TMC को एक नई धार दी।
यह वही बंगाल है, जहाँ राजनीति कभी कविता और आंदोलन में बहती थी। अब वह एल्गोरिद्म और एनालिटिक्स से भी चलती है। यह बदलाव अच्छा है या ख़तरनाक—इस पर बहस जारी है। पर इतना तय है कि इस बदलाव के केंद्र में प्रतीक जैन जैसे रणनीतिकार खड़े हैं।
वर्तमान में चर्चा में क्यों हैं
प्रतीक जैन हाल के दिनों में इसलिए सुर्खियों में हैं क्योंकि जनवरी 2026 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोयला तस्करी और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उनसे कथित संबंधों को लेकर कोलकाता स्थित I-PAC कार्यालय और उनके आवास सहित कई ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई उस समय और भी राजनीतिक रंग ले गई जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं उनके घर और I-PAC ऑफिस पहुँच गईं और आरोप लगाया कि जांच एजेंसी तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति, आईटी सेल से जुड़े दस्तावेज़ और डिजिटल डेटा जब्त करने के बहाने राजनीतिक जासूसी कर रही है। TMC ने इसे केंद्र सरकार की बदले की राजनीति बताया, जबकि ED ने जांच में बाधा डालने और सबूत हटाने के आरोप लगाए। इस टकराव ने मामले को केवल कानूनी नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक और संघीय विवाद में बदल दिया, जिससे प्रतीक जैन एक बार फिर “पर्दे के पीछे के रणनीतिकार” से निकलकर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गए हैं।
परछाइयों में रहने वाला चेहरा
प्रतीक जैन मीडिया से दूर रहते हैं। न उनके लंबे इंटरव्यू मिलते हैं, न सोशल मीडिया पर शोर। फिर भी उनका असर नेताओं के भाषणों में, पोस्टरों के नारों में और डिजिटल कैंपेन की लाइन-दर-लाइन रणनीति में दिखता है।
उनकी उम्र अभी ज़्यादा नहीं, पर उनके हाथों से गुज़रे चुनावों की सूची किसी अनुभवी राजनेता से कम नहीं लगती। यह दिखाता है कि अब राजनीति उम्र से नहीं, कौशल से तय होती है।
लोकतंत्र के लिए सवाल
यह कहानी सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं है। यह सवाल भी है—
क्या राजनीति अब जनता की भावना से ज़्यादा, रणनीति की गणना से चलने लगी है?
क्या मतदाता नागरिक से “डेटा पॉइंट” बनता जा रहा है?
या क्या यह सब लोकतंत्र को और सशक्त बना रहा है?
प्रतीक जैन इन सवालों का जवाब नहीं, बल्कि उनका प्रतीक हैं। वे उस दौर का चेहरा हैं जहाँ सत्ता, तकनीक और प्रबंधन एक-दूसरे में घुल चुके हैं।
अंत में
रविवार की चाय के साथ हम अक्सर नेताओं पर बात करते हैं। पर अब राजनीति केवल नेताओं से नहीं चलती। वह उन दिमागों से भी चलती है, जो परदे के पीछे बैठकर भविष्य की स्क्रिप्ट लिखते हैं।
प्रतीक जैन उन्हीं दिमागों में से एक हैं—
जो दिखते कम हैं,
पर लोकतंत्र की चाल में उनकी छाया हर मोड़ पर दिखाई देती है।
With The Hindu Inputs
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