सोशल मीडिया की न्यूनतम आयु सीमा: भारत के लिए एक संतुलित राष्ट्रीय नीति की अनिवार्यता
डिजिटल भारत की परिकल्पना ने देश को अभूतपूर्व रूप से जोड़ा है। आज भारत न केवल दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार है, बल्कि एक ऐसा समाज भी बन चुका है जहां एक अरब से अधिक लोग इंटरनेट से जुड़े हैं। यह उपलब्धि तकनीकी प्रगति और आर्थिक अवसरों का प्रतीक है, लेकिन इसके साथ एक गंभीर सामाजिक प्रश्न भी उभर कर आया है—क्या भारत ने अपने बच्चों और किशोरों को डिजिटल दुनिया के जोखिमों से बचाने के लिए पर्याप्त नीतिगत तैयारी की है? विशेष रूप से, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच की न्यूनतम आयु को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति का अभाव अब एक नीतिगत शून्य के रूप में सामने है।
वर्तमान में फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए पंजीकरण पर रोक लगाते हैं। यह व्यवस्था मुख्यतः अमेरिका के COPPA कानून और वैश्विक मानकों से प्रेरित है। किंतु भारत में इस आयु सीमा को लागू कराने के लिए कोई सशक्त और बाध्यकारी राष्ट्रीय कानून नहीं है। परिणामस्वरूप, आयु सत्यापन की कमजोर प्रक्रियाओं के कारण बड़ी संख्या में बच्चे छद्म पहचान या गलत जानकारी के सहारे इन प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय हैं।
भारत ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के माध्यम से बच्चों के डेटा संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के डेटा के प्रसंस्करण हेतु अभिभावकीय सहमति आवश्यक है और लक्षित विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाया गया है। फिर भी, यह कानून मुख्यतः डेटा सुरक्षा तक सीमित है; यह इस प्रश्न का समाधान नहीं करता कि बच्चों को सोशल मीडिया तक किस हद तक और किस उम्र में पहुंच मिलनी चाहिए। यही वह अंतराल है जहां नीति की आवश्यकता सबसे अधिक महसूस होती है।
हालिया आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने इस चिंता को स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया है। उन्होंने कहा है कि युवा उपयोगकर्ता सोशल मीडिया के compulsive उपयोग, हानिकारक कंटेंट और एल्गोरिदमिक प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। सर्वेक्षण में प्लेटफॉर्म्स को उम्र-सत्यापन तंत्र और उम्र-उपयुक्त डिफॉल्ट सेटिंग्स अपनाने की सिफारिश की गई है। यद्यपि ये सुझाव बाध्यकारी नहीं हैं, फिर भी नीति विमर्श में इनका महत्व असंदिग्ध है।
वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत अकेला नहीं है। ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कड़ा प्रतिबंध लागू किया है। फ्रांस 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए अभिभावकीय अनुमति को अनिवार्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि ब्रिटेन और डेनमार्क जैसे देश सोशल मीडिया के मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों की गहन जांच कर रहे हैं। यह रुझान दर्शाता है कि दुनिया भर में डिजिटल स्वतंत्रता और बाल संरक्षण के बीच संतुलन खोजा जा रहा है।
भारत में भी इस दिशा में हलचल तेज हो रही है। आंध्र प्रदेश और गोवा जैसे राज्य ऑस्ट्रेलियाई मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री द्वारा बच्चों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने की आवश्यकता पर दिया गया जोर यह संकेत देता है कि नीति बहस अब केवल सैद्धांतिक नहीं रही। किंतु संघीय ढांचे में अलग-अलग राज्यीय नियम लागू होना डिजिटल शासन को जटिल बना सकता है। इंटरनेट और सोशल मीडिया की प्रकृति सीमाओं से परे है; ऐसे में खंडित नीतियां प्रभावी प्रवर्तन में बाधा बन सकती हैं।
एक राष्ट्रीय न्यूनतम आयु नीति के लाभ स्पष्ट हैं। यह बच्चों को साइबर बुलिंग, अश्लील या हिंसक सामग्री, डिजिटल व्यसन, नींद की कमी और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से बचाने में सहायक हो सकती है। साथ ही, यह सोशल मीडिया कंपनियों को अधिक जवाबदेह बनाएगी और “डिज़ाइन फॉर एडिक्शन” जैसी प्रथाओं पर अंकुश लगाएगी।
हालांकि, पूर्ण प्रतिबंध अपने साथ चुनौतियां भी लाता है। आज कई शैक्षणिक संसाधन, रचनात्मक अभिव्यक्ति के मंच और मानसिक स्वास्थ्य सहायता समूह सोशल मीडिया के माध्यम से ही सुलभ हैं। ग्रामीण और निम्न-आय वर्गों के लिए, जहां स्मार्टफोन ही शिक्षा और सूचना का मुख्य साधन है, कठोर प्रतिबंध अवसरों की असमानता को बढ़ा सकता है।
इसलिए, भारत के लिए समाधान या तो–या का नहीं, बल्कि संतुलन का होना चाहिए। एक व्यवहारिक नीति में निम्नलिखित तत्व शामिल हो सकते हैं:
- राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम आयु सीमा का स्पष्ट निर्धारण
- 13–16 वर्ष के आयु वर्ग के लिए चरणबद्ध और सीमित पहुंच, जैसे सीमित फीचर्स और सख्त गोपनीयता सेटिंग्स
- मजबूत और गोपनीयता-सम्मत आयु सत्यापन तंत्र
- स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन सुरक्षा शिक्षा
- अभिभावकों के लिए जागरूकता और नियंत्रण उपकरण
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि सोशल मीडिया अच्छा है या बुरा, बल्कि यह है कि क्या भारत अपने बच्चों के लिए एक सुरक्षित, संतुलित और जिम्मेदार डिजिटल वातावरण तैयार कर सकता है। मुख्य आर्थिक सलाहकार की सिफारिश ने इस बहस को नीति के केंद्र में ला दिया है। अब आवश्यकता है कि केंद्र सरकार इसे ठोस राष्ट्रीय नीति में रूपांतरित करे, ताकि एक अरब इंटरनेट उपयोगकर्ताओं वाला भारत न केवल डिजिटल रूप से सशक्त, बल्कि सामाजिक रूप से भी सुरक्षित भविष्य की ओर अग्रसर हो सके।
With Reuters Inputs
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