The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...
भारत की हरित ऊर्जा क्रांति: जीवाश्म ईंधन से हाइड्रो और नवीकरणीय स्रोतों की ओर संतुलित संक्रमण
परिचय
भारत का ऊर्जा क्षेत्र 2026 की शुरुआत में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां गैर-जीवाश्म ईंधन की स्थापित क्षमता ने कुल क्षमता के 52 प्रतिशत से अधिक का आंकड़ा छू लिया है। 2025 में रिकॉर्ड 49.12 गीगावाट (GW) गैर-जीवाश्म क्षमता जोड़ी गई, जिससे कुल नॉन-फॉसिल क्षमता 266.78 GW तक पहुंच गई—यह 2024 की तुलना में 22.6 प्रतिशत की वृद्धि है। यह उपलब्धि पेरिस समझौते के तहत 2030 तक 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्य को पांच वर्ष पहले हासिल करने का प्रमाण है, जो भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को मजबूती प्रदान करती है। फिर भी, कोयला-आधारित बिजली उत्पादन अभी भी कुल उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जबकि पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता अर्थव्यवस्था की एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस संक्रमण में हाइड्रो पावर एक संतुलनकारी भूमिका निभा रही है, जो सौर और पवन जैसी अंतरालिक ऊर्जा स्रोतों को स्थिरता प्रदान करती है।यह लेख ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु जिम्मेदारी और आर्थिक विकास के त्रिवेणी संगम का विश्लेषण करता है, जहां भारत न केवल वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर है, बल्कि घरेलू जरूरतों को भी संतुलित रूप से संबोधित कर रहा है।वर्तमान ऊर्जा संरचना: 2025-26 का यथार्थ
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2025 तक भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता 510 GW के करीब पहुंच चुकी है। इसमें गैर-जीवाश्म स्रोतों (सौर, पवन, हाइड्रो, न्यूक्लियर और अन्य) का हिस्सा 266.78 GW (लगभग 52 प्रतिशत) है, जबकि जीवाश्म-आधारित क्षमता 244 GW (48 प्रतिशत) है। गैर-जीवाश्म क्षमता का ब्रेकडाउन इस प्रकार है:- सौर: 135.81 GW (सबसे तेज वृद्धि, 2025 में 37.95 GW जोड़े गए)।
- पवन: 54.51 GW (2025 में 6.35 GW की वृद्धि)।
- बड़े हाइड्रो (पंप्ड स्टोरेज सहित): लगभग 51 GW।
- न्यूक्लियर और अन्य: 9-20 GW।
कोयला: ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़, लेकिन पर्यावरणीय बोझ
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोक्ता है। 2025 में कोयला-आधारित उत्पादन में 3 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद, यह बेस-लोड आपूर्ति का आधार बना हुआ है। कोयले की भूमिका औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण है—स्टील, सीमेंट और अन्य क्षेत्रों में सस्ती ऊर्जा प्रदान करना। घरेलू उत्पादन से आयात निर्भरता कम हुई है, जो ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करता है।फिर भी, चुनौतियां गंभीर हैं: उच्च कार्बन उत्सर्जन, वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य लागत। वैश्विक जलवायु दबाव के बीच भारत "कोल एग्जिट" के बजाय "कोल ट्रांजिशन" की नीति पर चल रहा है। सुपरक्रिटिकल और अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल प्लांट्स, साथ ही बायोमास को-फायरिंग (2025-26 से 7 प्रतिशत) जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं। 2030 तक कोयला क्षमता 252 GW तक सीमित रखने की आवश्यकता है, क्योंकि इससे अधिक में प्लांट लोड फैक्टर (PLF) गिरकर 51.8 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जो स्ट्रैंडेड एसेट्स का जोखिम बढ़ाएगा।पेट्रोलियम: अर्थव्यवस्था की धुरी, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिम
पेट्रोलियम भारत की 85 प्रतिशत से अधिक जरूरतों का आयातित स्रोत है, जो परिवहन और उद्योग की रीढ़ है। बिजली उत्पादन में इसका योगदान सीमित है, लेकिन मोबिलिटी और पेट्रोकेमिकल्स में अपरिहार्य। वैश्विक मूल्य अस्थिरता और भू-राजनीतिक जोखिम ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा पैदा करते हैं।नीतिगत स्तर पर, इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20 लक्ष्य हासिल), इलेक्ट्रिक वाहन (EV) प्रोत्साहन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्प अपनाए जा रहे हैं। रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व का विस्तार भी जारी है। यह संक्रमण जीवाश्म ईंधन से हरित विकल्पों की ओर है, जो आर्थिक विकास को बनाए रखते हुए उत्सर्जन कम करेगा।हाइड्रो पावर: ग्रिड स्थिरता का आधार
बड़े हाइड्रो की क्षमता 51 GW (कुल का 10 प्रतिशत) है, जो पीक-लोड सपोर्ट और फ्रीक्वेंसी रेगुलेशन में महत्वपूर्ण है। सौर-पवन की अंतरालिकता को बैलेंस करने में हाइड्रो बैक-अप प्रदान करती है। 2025 में लोअर सुबांसिरी प्रोजेक्ट (2000 MW) का पहला यूनिट कमिशन हुआ, दूसरा दिसंबर 2025 में, और बाकी 2026-27 में चरणबद्ध रूप से। यह प्रोजेक्ट उत्तर-पूर्वी ग्रिड को मजबूत करेगा और 7400 मिलियन यूनिट वार्षिक उत्पादन करेगा।चुनौतियां: पर्यावरणीय प्रभाव (जैव-विविधता, विस्थापन), लंबा निर्माण समय और जलवायु परिवर्तन (सूखा/बाढ़)। भविष्य में पंप्ड स्टोरेज हाइड्रो (PSP) पर फोकस है—2032 तक 50 GW लक्ष्य, जो बैटरी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के साथ मिलकर ग्रिड स्थिरता बढ़ाएगा।सौर और पवन: हरित वृद्धि की मुख्य धारा
2025 में रिन्यूएबल्स में रिकॉर्ड 41-50 GW जोड़े गए, जिसमें सौर ने 35-38 GW का योगदान दिया। सौर अब 135.81 GW और पवन 54.51 GW पर है। यह वृद्धि रोजगार सृजन, निवेश आकर्षण और वैश्विक जलवायु नेतृत्व को बढ़ावा देती है।सीमाएं: अंतरालिक प्रकृति और ग्रिड इंटीग्रेशन। समाधान के रूप में PSP और BESS पर निर्भरता बढ़ रही है, जो 2026 में 10 गुना वृद्धि की उम्मीद है।समग्र मॉडल: संतुलित त्रिस्तंभीय दृष्टिकोण
भारत की ऊर्जा नीति तीन स्तंभों पर टिकी है:- गति: सौर और पवन का तेज विस्तार।
- स्थिरता: कोयला और हाइड्रो से बेस-लोड और पीक सपोर्ट।
- संक्रमण: पेट्रोलियम से EV और ग्रीन हाइड्रोजन की ओर।
Comments
Post a Comment