भारत की अर्थव्यवस्था: आईएमएफ के संशोधित अनुमान और विकास की नई व्याख्या
— एक संपादकीय दृष्टिकोण
भारत की अर्थव्यवस्था एक बार फिर वैश्विक विमर्श के केंद्र में है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा वित्तीय वर्ष 2025–26 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 6.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.3 प्रतिशत किया जाना केवल एक सांख्यिकीय संशोधन नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है, जो पिछले एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर आकार ले चुका है।
यह संशोधन ऐसे समय आया है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था व्यापार युद्धों, भू-राजनीतिक तनावों, उच्च ब्याज दरों और आपूर्ति शृंखला के पुनर्संयोजन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। इसके बावजूद भारत का अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन यह बताता है कि घरेलू आर्थिक आधार अब पहले से कहीं अधिक लचीला और आत्मनिर्भर हो चुका है।
वृद्धि के पीछे की अर्थव्यवस्था
आईएमएफ के आकलन का आधार भारत का हालिया आर्थिक प्रदर्शन है। जुलाई–सितंबर 2025 की तिमाही में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि और पहली छमाही में औसतन 8 प्रतिशत की दर यह दर्शाती है कि घरेलू मांग अभी भी अर्थव्यवस्था की प्रमुख प्रेरक शक्ति बनी हुई है।
उपभोग में स्थिरता, सार्वजनिक और निजी निवेश में वृद्धि तथा कॉरपोरेट आय में सुधार ने इस गति को बनाए रखा है। साथ ही, खाद्य कीमतों में नरमी के कारण मुद्रास्फीति का आरबीआई के लक्ष्य दायरे के भीतर आना नीति-निर्माताओं को विकासोन्मुख नीतियों के लिए अतिरिक्त स्थान प्रदान करता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि यह वृद्धि ऐसे समय में आई है, जब वैश्विक व्यापार पर टैरिफ, संरक्षणवाद और राजनीतिक तनावों का दबाव है। इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था का टिके रहना इस बात का प्रमाण है कि अब वह केवल निर्यात-आधारित या बाहरी मांग पर निर्भर नहीं रही, बल्कि उसका मुख्य आधार घरेलू बाजार बन चुका है।
वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति
आईएमएफ के अनुमान भारत को 2026 तक भी दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में रखते हैं। जहां वैश्विक वृद्धि 3 प्रतिशत के आसपास सिमटने की संभावना है और चीन, अमेरिका व यूरोप अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ेंगे, वहीं भारत 6 से 7 प्रतिशत के बीच अपनी रफ्तार बनाए रखने में सक्षम दिखता है।
यह स्थिति भारत को वैश्विक विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनाती है। अंतरराष्ट्रीय पूंजी, निवेश और उत्पादन शृंखलाओं के पुनर्संयोजन के दौर में भारत एक आकर्षक विकल्प के रूप में उभर रहा है—विशेषकर “चीन+1” रणनीति के संदर्भ में।
क्या यह ‘आर्थिक महाशक्ति’ बनने की शुरुआत है?
उच्च विकास दर अक्सर ‘इकोनॉमिक सुपरपावर’ बनने की चर्चा को जन्म देती है। निस्संदेह, भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप संस्कृति, बुनियादी ढांचा निवेश और युवा जनसंख्या इसे एक दीर्घकालिक आर्थिक शक्ति बनने की क्षमता प्रदान करते हैं।
लेकिन इतिहास बताता है कि केवल तेज़ वृद्धि पर्याप्त नहीं होती। आर्थिक महाशक्ति वही बनती है, जिसकी वृद्धि समावेशी, टिकाऊ और सामाजिक रूप से संतुलित हो। भारत के सामने आज भी कुछ बुनियादी प्रश्न खड़े हैं—क्या यह वृद्धि पर्याप्त रोजगार पैदा कर रही है? क्या आय और अवसरों की असमानता कम हो रही है? क्या पर्यावरणीय लागत को संतुलित किया जा रहा है?
शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास में निवेश, श्रम बाजार में सुधार, निर्यात प्रतिस्पर्धा और हरित विकास जैसे क्षेत्र तय करेंगे कि यह वृद्धि केवल आंकड़ों तक सीमित रहेगी या वास्तव में समाज के हर वर्ग तक पहुंचेगी।
आगे की राह
आईएमएफ का यह संशोधित अनुमान भारत की आर्थिक नीति और संस्थागत स्थिरता पर अंतरराष्ट्रीय विश्वास का संकेत है। लेकिन यह एक उपलब्धि से अधिक एक अवसर है—अवसर यह सुनिश्चित करने का कि आने वाले वर्षों में विकास केवल तेज़ न हो, बल्कि न्यायसंगत और टिकाऊ भी हो।
यदि भारत इस गति को सामाजिक समावेशन, पर्यावरणीय संतुलन और संस्थागत मजबूती के साथ जोड़ पाता है, तो वह केवल एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक जिम्मेदार और प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभर सकता है। यही वह मार्ग है, जो ‘आर्थिक शक्ति’ को ‘सार्वजनिक समृद्धि’ में बदल सकता है।
With The Hindu Inputs
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