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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Evolution of India’s Union Budget: From Crisis to Growth

भारत के केंद्रीय बजट का ऐतिहासिक विकास: ब्लैक बजट से ड्रीम बजट तक आर्थिक नीति की यात्रा

भारत का केंद्रीय बजट केवल आय-व्यय का वार्षिक लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की आर्थिक सोच, राजनीतिक प्राथमिकताओं और सामाजिक दृष्टि का जीवंत दस्तावेज़ रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से प्रत्येक बजट ने अपने समय की चुनौतियों का सामना किया है और अर्थव्यवस्था को नई दिशा प्रदान की है। कुछ बजट इतिहास में ‘ब्लैक बजट’ या ‘ड्रीम बजट’ जैसे नामों से अंकित हुए, जबकि कुछ ने संकट से उबारने वाले निर्णायक मोड़ का काम किया। इनके माध्यम से भारत ने संरक्षणवादी ढांचे से उदारीकरण की ओर, और अब समावेशी तथा खपत-आधारित विकास की यात्रा तय की है।

बजट: आर्थिक नीति का दर्पण

लोकतांत्रिक व्यवस्था में केंद्रीय बजट सरकार के लिए वह प्रमुख मंच होता है, जहां वह अपनी आर्थिक रणनीति, कर नीति, व्यय प्राथमिकताओं और सामाजिक कल्याण की योजनाओं को स्पष्ट रूप से जनता के समक्ष रखती है। रक्षा, बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और गरीबी उन्मूलन जैसे क्षेत्रों में आवंटन सरकार की वास्तविक मंशा को उजागर करते हैं। कुछ बजट मात्र संख्यात्मक दस्तावेज नहीं रहते, बल्कि वे ऐतिहासिक परिवर्तन के प्रतीक बन जाते हैं, जो दीर्घकालिक आर्थिक संरचना को प्रभावित करते हैं।

स्वतंत्र भारत का प्रथम बजट (1947-48): नींव रखने की कोशिश

26 नवंबर 1947 को वित्त मंत्री आर.के. शनमुखम चेट्टी द्वारा प्रस्तुत अंतरिम बजट स्वतंत्र भारत का प्रथम बजट था। विभाजन के बाद की अराजकता, शरणार्थी संकट और सीमित संसाधनों के बीच यह बजट मुख्यतः प्रशासनिक स्थिरता और आवश्यक व्यय पर केंद्रित था। रक्षा पर भारी आवंटन उस समय की भू-राजनीतिक चिंताओं को दर्शाता था। यद्यपि इसमें बड़े सुधार नहीं थे, तथापि यह नवजात गणतंत्र की आर्थिक नींव रखने वाला महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ।

‘ब्लैक बजट’ (1979-80): विवाद और राजनीतिक संकट

1979-80 का बजट भारतीय बजट इतिहास में ‘ब्लैक बजट’ के रूप में कुख्यात है। चौधरी चरण सिंह सरकार द्वारा प्रस्तुत इस बजट में उच्च आय वर्ग पर करों का बोझ बढ़ाया गया। आयकर दरों में वृद्धि, नए कर और कड़े प्रावधानों ने व्यापारिक समुदाय और मध्यम वर्ग में व्यापक असंतोष उत्पन्न किया। आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि में पेश यह बजट राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो गया और सरकार का पतन हुआ। यह घटना दर्शाती है कि आर्थिक नीतियां कितनी भी आवश्यक क्यों न हों, यदि उन्हें सामाजिक एवं राजनीतिक स्वीकार्यता न मिले, तो वे टिकाऊ नहीं रह पातीं।

1991 का उदारीकरण बजट: आर्थिक इतिहास का टर्निंग पॉइंट

24 जुलाई 1991 को डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा प्रस्तुत बजट भारतीय अर्थव्यवस्था का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भुगतान संतुलन का गंभीर संकट, विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग समाप्त होना और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच इस बजट ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नीति अपनाई। लाइसेंस-परमिट राज का अंत, आयात शुल्क में कमी, विदेशी निवेश को प्रोत्साहन और अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार से जोड़ना—ये कदम भारत को बंद अर्थव्यवस्था से खुली, प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में बदलने वाले थे।

इस बजट की दूरगामी उपलब्धियां आज स्पष्ट हैं: सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र का उदय, सेवा क्षेत्र का विस्तार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रवेश और विदेशी पूंजी का प्रवाह। यह बजट संकट को अवसर में बदलने का एक दुर्लभ उदाहरण है।

‘ड्रीम बजट’ (1997-98): कर सुधार और बाजार आत्मविश्वास

पी. चिदंबरम द्वारा 1997-98 में प्रस्तुत बजट को ‘ड्रीम बजट’ की संज्ञा दी गई। इसमें कर प्रणाली को सरल बनाया गया, अधिकतम आयकर दर 30 प्रतिशत तक सीमित की गई और पूंजी बाजार को प्रोत्साहन प्रदान किया गया। मध्यम वर्ग को राहत मिलने से उपभोग और निवेश में वृद्धि हुई। यह बजट इस विचार का प्रतीक बना कि कर दरों में विवेकपूर्ण कमी से कर आधार विस्तृत हो सकता है और आर्थिक गतिविधियां तेज हो सकती हैं। 1990 के दशक के अंत में यह भारत के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतिबिंब था।

मिलेनियम बजट (2000-01): सुधारों की शुरुआत और रोल बैक

वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा द्वारा प्रस्तुत 2000-01 का बजट नई सहस्राब्दी की शुरुआत में आया। इसमें टैक्स स्लैब में बदलाव और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस किया गया। हालांकि कुछ प्रस्तावों को बाद में वापस लेना पड़ा, जिसके कारण इसे ‘रोल बैक बजट’ भी कहा जाता है, फिर भी इसने आर्थिक सुधारों की निरंतरता बनाए रखी और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए।

बजट 2025-26: खपत और समावेशी विकास पर जोर

1 फरवरी 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट 2025-26 ने मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ाने और घरेलू खपत को मजबूत करने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। प्रमुख प्रावधानों में नई कर व्यवस्था के तहत कर-मुक्त आय सीमा को बढ़ाकर ₹12 लाख तक करना शामिल है, जिससे मध्यम वर्ग के हाथ में अधिक धन रहा और उपभोग, बचत तथा निवेश को प्रोत्साहन मिला। कैपिटल एक्सपेंडिचर (कैपेक्स) को 11.21 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाया गया, जो जीडीपी का 3.1 प्रतिशत है। इंफ्रास्ट्रक्चर, कृषि (प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना), एमएसएमई और स्टार्टअप्स पर फोकस के साथ यह बजट समावेशी विकास और आर्थिक लचीलापन का प्रतीक बना। यह बजट घरेलू मांग को रफ्तार देने वाला और ‘विकसित भारत’ की दिशा में ठोस कदम माना गया।

निष्कर्ष: विरासत और भविष्य की दिशा

भारत के बजटों की यह यात्रा संकट प्रबंधन से विकासोन्मुखी नीतियों तक की गवाही देती है। प्रत्येक बजट ने अपने संदर्भ में राष्ट्र को आगे बढ़ाया है। बजट 2026 की तैयारियां चल रही हैं, जो निस्संदेह इस ऐतिहासिक विरासत को आगे बढ़ाएगा। आर्थिक मजबूती, सामाजिक न्याय और सतत विकास का संतुलन बनाए रखना ही भविष्य के बजटों की प्रमुख चुनौती रहेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था की यह प्रगति बजटों के माध्यम से निरंतर जारी है—एक ऐसी कहानी जो चुनौतियों से अवसरों की ओर बढ़ती रही है।

📚 महत्वपूर्ण स्रोत (Important Sources)

  1. Union Budget Documents (भारत सरकार)
    – Budget Speech, Expenditure Profile, Economic Survey
    – Ministry of Finance, Government of India

  2. Economic Survey of India (वर्षानुसार)
    – विशेषकर 1991 सुधार, कर नीति, कैपेक्स और खपत आधारित विकास से संबंधित अध्याय

  3. Reserve Bank of India (RBI) Publications
    – Handbook of Statistics on Indian Economy
    – RBI Annual Reports (BoP Crisis 1991, Fiscal Policy Analysis)

  4. Planning Commission / NITI Aayog Reports
    – विकास रणनीति, समावेशी विकास, सार्वजनिक व्यय प्राथमिकताएँ

  5. The Hindu & Indian Express (Editorial Archives)
    – 1991 Budget, Dream Budget 1997, Budget 2025-26 पर विश्लेषणात्मक संपादकीय

  6. NCERT – Indian Economic Development (Class XI–XII)
    – Liberalisation, Privatisation and Globalisation (LPG reforms)

  7. Bimal Jalan & Montek Singh Ahluwalia – Selected Writings
    – भारतीय आर्थिक सुधारों पर विश्लेषण

  8. PRS Legislative Research
    – Union Budget Analysis (Sector-wise & Policy Impact)

  9. Ministry of Statistics & Programme Implementation (MoSPI)
    – GDP, Consumption, Investment data

  10. World Bank & IMF Reports (Contextual Reference)
    – 1991 Balance of Payments Crisis background


✍️Dynamic GK Team

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