Economic Survey 2025–26: Global Uncertainty, India’s Growth Momentum, Digital Challenges and Policy Roadmap
आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26: वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की स्थिर गति और नीतिगत दिशा
हर वर्ष बजट सत्र से पूर्व प्रस्तुत किया जाने वाला आर्थिक सर्वेक्षण केवल आँकड़ों का दस्तावेज़ नहीं होता, बल्कि यह देश की आर्थिक आत्मकथा और भविष्य की दिशा का संकेतक भी होता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26, जिसे मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन और उनकी टीम ने तैयार किया है, एक ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरे असंतुलन, भू-राजनीतिक तनावों और वित्तीय अनिश्चितताओं से जूझ रही है। ऐसे चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिदृश्य में यह सर्वेक्षण भारत की अर्थव्यवस्था को “सतर्क आशावाद” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है।
वैश्विक पृष्ठभूमि: संकट की छाया में विश्व अर्थव्यवस्था
सर्वेक्षण स्पष्ट करता है कि वैश्विक आर्थिक वातावरण अत्यंत नाजुक बना हुआ है। धीमी वृद्धि, बढ़ते कर्ज, भू-राजनीतिक संघर्ष और आपूर्ति शृंखला में बाधाएँ वैश्विक विकास को सीमित कर रही हैं। सर्वेक्षण में यह तक कहा गया है कि 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से भी अधिक गंभीर संकट की 10–20 प्रतिशत संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे समय में विकसित अर्थव्यवस्थाओं की नीतिगत अनिश्चितता और संरक्षणवादी रुझान विकासशील देशों के लिए अतिरिक्त चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं।
भारत की विकास गाथा: आंतरिक मजबूती का परिणाम
इन वैश्विक चुनौतियों के विपरीत, भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई देती है। सर्वेक्षण ने भारत की मध्यम अवधि की विकास दर को 6.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत आंका है, जबकि वित्त वर्ष 2026–27 के लिए 6.8 से 7.2 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया है। यह भरोसा आकस्मिक नहीं, बल्कि मजबूत आंतरिक आधारों पर टिका है—
- संरचनात्मक एवं नियामक सुधार
- सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में वृद्धि
- बुनियादी ढाँचे का विस्तार
- निजी क्षेत्र की पुनः सक्रिय भागीदारी
भारत की वृद्धि अब केवल उपभोग-आधारित नहीं, बल्कि निवेश और उत्पादकता-आधारित स्वरूप ग्रहण कर रही है।
सोने का पुनरुत्थान: रणनीतिक संपत्ति के रूप में भूमिका
आर्थिक सर्वेक्षण का एक रोचक और महत्वपूर्ण पक्ष सोने की बढ़ती रणनीतिक भूमिका है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों, अमेरिकी डॉलर की कमजोरी और वित्तीय बाजारों की अस्थिरता ने सोने को एक बार फिर सुरक्षित निवेश के रूप में स्थापित किया है। भारत में सोने की माँग बढ़ने से न केवल घरेलू निवेश व्यवहार प्रभावित हुआ है, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती में भी योगदान मिला है।
अब सोना केवल सांस्कृतिक या परंपरागत निवेश नहीं, बल्कि वैश्विक अनिश्चितता के दौर में आर्थिक सुरक्षा कवच बनता जा रहा है।
डिजिटल युग की चुनौती: डिजिटल व्यसन और सामाजिक दायित्व
सर्वेक्षण का एक अत्यंत संवेदनशील और दूरदर्शी हस्तक्षेप डिजिटल व्यसन के बढ़ते खतरे को लेकर है। भारत, मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम) और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स का विश्व का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता बाजार बन चुका है, जहाँ बच्चों और किशोरों की अत्यधिक स्क्रीन-निर्भरता गंभीर चिंता का विषय है।
सर्वेक्षण सरकार से आग्रह करता है कि—
- सोशल मीडिया ऐप्स पर आयु-आधारित पहुँच सीमाएँ तय की जाएँ
- प्लेटफॉर्म्स पर आयु सत्यापन प्रणाली लागू हो
- बच्चों के लिए आयु-उपयुक्त डिफॉल्ट सेटिंग्स सुनिश्चित की जाएँ
- लक्षित विज्ञापनों पर नियंत्रण रखा जाए
साथ ही, परिवारों और समाज की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है—स्क्रीन टाइम सीमित करना, डिवाइस-मुक्त समय और ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देना आज केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक उत्पादकता का भी प्रश्न बन चुका है।
सेवाक्षेत्र और सुधारों की राजनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बजट सत्र की शुरुआत में भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते का स्वागत करते हुए दिया गया वक्तव्य—“भारत अब रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार है”—सरकार की आर्थिक दृष्टि को संक्षेप में अभिव्यक्त करता है। सर्वेक्षण भी इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए सेवाक्षेत्र की भूमिका को स्थिरता के स्तंभ के रूप में प्रस्तुत करता है।
वर्तमान में सेवाक्षेत्र—
- जीडीपी में 53.6 प्रतिशत
- सकल मूल्य वर्धन में 56.4 प्रतिशत
का योगदान दे रहा है। वैश्विक मंदी के बावजूद सेवाओं के निर्यात ने भारतीय अर्थव्यवस्था को संतुलन प्रदान किया है, जो भारत की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को दर्शाता है।
शेष चुनौतियाँ: बदलता वैश्विक व्यापार परिदृश्य
फिर भी, सर्वेक्षण यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाता है। अमेरिकी टैरिफ नीतियों और वैश्विक व्यापार पुनर्संरेखण का असर रत्न-आभूषण, वस्त्र और श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर पड़ा है। इसके प्रत्युत्तर में भारत अपने निर्यात को मध्य पूर्व, यूरोप और अफ्रीका की ओर पुनर्निर्देशित कर रहा है।
तेल आयात में भी विविधता आई है, जहाँ अब लीबिया, मिस्र, ब्राजील जैसे नए स्रोत शामिल हो रहे हैं—जो ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से सकारात्मक संकेत है।
निष्कर्ष: आशावाद के साथ सावधानी
आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 भारत को वैश्विक अंधकार में एक उज्ज्वल बिंदु के रूप में प्रस्तुत करता है, किंतु यह भी स्पष्ट करता है कि यह सफलता स्वतःस्फूर्त नहीं है। समावेशी विकास, युवाओं के लिए रोजगार सृजन, एमएसएमई को समर्थन, डिजिटल नियमन और सामाजिक संतुलन—ये सभी आने वाले वर्षों की निर्णायक कसौटियाँ होंगी।
अंततः, यह सर्वेक्षण केवल वर्तमान का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि नीति-निर्माण का रोडमैप है—जो भारत को एक आत्मनिर्भर, समावेशी और विकसित राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ाने की बौद्धिक नींव प्रदान करता है।
With Live mint Inputs
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