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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Jimmy Lai Verdict 2026: Hong Kong’s Press Freedom Crushed Under China’s National Security Law

जिमी लाई: हॉन्ग कॉन्ग की प्रेस स्वतंत्रता और लोकतंत्र की लड़ाई का प्रतीक

9 फरवरी 2026 को हॉन्ग कॉन्ग के इतिहास में एक ऐसा निर्णय दर्ज हुआ, जिसने शहर की आत्मा, उसकी प्रेस स्वतंत्रता और “एक देश, दो प्रणाली” की अवधारणा पर गहरे प्रश्नचिह्न लगा दिए। हॉन्ग कॉन्ग हाई कोर्ट ने 78 वर्षीय मीडिया उद्यमी, लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता और बीजिंग के मुखर आलोचक जिमी लाई (लाई ची-यिंग) को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSL) के तहत 20 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई।
यह सजा न केवल NSL के तहत अब तक की सबसे लंबी सजा है, बल्कि लाई की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए इसे व्यापक रूप से व्यावहारिक आजीवन कारावास माना जा रहा है।

यह फैसला किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह हॉन्ग कॉन्ग के उस दौर के अंत का प्रतीक है, जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता, राजनीतिक असहमति और नागरिक स्वतंत्रताएँ शहर की पहचान हुआ करती थीं।


एक शरणार्थी से मीडिया सम्राट तक: जिमी लाई की यात्रा

जिमी लाई की कहानी स्वयं में संघर्ष, साहस और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। मुख्यभूमि चीन में जन्मे लाई किशोरावस्था में ही कम्युनिस्ट शासन से भागकर हॉन्ग कॉन्ग पहुँचे। यहाँ उन्होंने एक फैक्ट्री मज़दूर के रूप में काम शुरू किया और धीरे-धीरे एक सफल परिधान व्यवसायी बने।

लेकिन उनकी असली पहचान बनी 1995 में स्थापित अख़बार ‘एप्पल डेली’। यह अख़बार सिर्फ एक मीडिया संस्थान नहीं था, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने वाली एक निर्भीक आवाज़ था।
एप्पल डेली ने:

  • चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की नीतियों की खुली आलोचना की
  • हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्तता और नागरिक स्वतंत्रताओं का समर्थन किया
  • 2014 के अम्ब्रेला मूवमेंट और 2019 के लोकतंत्र समर्थक आंदोलनों को मुखर मंच दिया

यही निर्भीकता जिमी लाई को बीजिंग की नज़रों में “राज्य विरोधी” बना गई।


राष्ट्रीय सुरक्षा कानून: कानून या नियंत्रण का औज़ार?

2020 में लागू राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSL) हॉन्ग कॉन्ग के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। बीजिंग द्वारा सीधे थोपा गया यह कानून:

  • “देशद्रोह”,
  • “विदेशी ताक़तों से साठगांठ”,
  • और “राजद्रोहपूर्ण गतिविधियों”
    जैसे अत्यंत अस्पष्ट और व्यापक अपराधों को परिभाषित करता है।

आलोचकों के अनुसार, NSL का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा से अधिक राजनीतिक असहमति को कुचलना है। जिमी लाई इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरे।


मुकदमे की पृष्ठभूमि और अदालत का फैसला

दिसंबर 2025 में हॉन्ग कॉन्ग हाई कोर्ट ने जिमी लाई को तीन प्रमुख आरोपों में दोषी ठहराया:

  1. विदेशी शक्तियों से साजिश – दो मामलों में,
  2. राजद्रोहपूर्ण सामग्री प्रकाशित करने की साजिश

अभियोजन पक्ष ने एप्पल डेली में प्रकाशित 160 से अधिक लेखों को सबूत के रूप में पेश किया, जिनमें अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों से हॉन्ग कॉन्ग और चीन पर प्रतिबंध लगाने की अपीलों का हवाला दिया गया था।
अदालत ने लाई को इन गतिविधियों का “मास्टरमाइंड” बताते हुए अपराध को गंभीर, सुनियोजित और समाज के लिए खतरनाक करार दिया।

हालाँकि कानून के तहत अधिकतम सजा आजीवन कारावास हो सकती थी, लेकिन अदालत ने कुल 20 वर्ष की सजा सुनाई, जो पहले से मिले एक अलग धोखाधड़ी मामले की सजा से अलग है।


एप्पल डेली का अंत: प्रेस स्वतंत्रता पर निर्णायक प्रहार

NSL लागू होने के बाद जून 2021 में एप्पल डेली पर पुलिस छापे पड़े, संपत्तियाँ ज़ब्त की गईं और वरिष्ठ संपादकों को गिरफ़्तार किया गया। आर्थिक और कानूनी दबाव के चलते अख़बार को बंद करना पड़ा।
एक ऐसे शहर में, जो कभी एशिया की प्रेस स्वतंत्रता का गढ़ था, यह घटना मौन थोपे जाने का प्रतीक बन गई।


अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: निंदा, लेकिन सीमित प्रभाव

जिमी लाई की सजा पर वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएँ आईं:

  • ब्रिटेन, जहाँ लाई नागरिक हैं, ने इसे “व्यावहारिक आजीवन कारावास” कहा।
  • संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया।
  • अमेरिका, यूरोपीय संघ और RSF ने इसे प्रेस स्वतंत्रता पर घातक हमला करार दिया।

RSF ने स्पष्ट कहा कि लाई की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए यह सजा मृत्युदंड के समान है।
फिर भी, ये प्रतिक्रियाएँ अब तक बीजिंग की नीति को बदलने में असमर्थ रही हैं।


हॉन्ग कॉन्ग का बदलता राजनीतिक परिदृश्य

आज हॉन्ग कॉन्ग:

  • निर्वाचित विपक्षी विधायकों के बिना,
  • स्वतंत्र मीडिया के बिना,
  • और भय के माहौल में जी रहे नागरिकों के साथ
    एक बिल्कुल अलग शहर बन चुका है।

NSL के बाद दर्जनों लोकतंत्र समर्थक नेता, छात्र कार्यकर्ता और पत्रकार जेल में हैं। “एक देश, दो प्रणाली” अब व्यवहार में एक सैद्धांतिक नारा मात्र रह गया है।


जिमी लाई: व्यक्ति नहीं, प्रतीक

जिमी लाई अब सिर्फ एक कैदी नहीं हैं। वे:

  • अहिंसक प्रतिरोध,
  • स्वतंत्र प्रेस,
  • और लोकतांत्रिक मूल्यों की कीमत
    का वैश्विक प्रतीक बन चुके हैं।

उनकी आवाज़ जेल की दीवारों के पीछे दबाई जा सकती है, लेकिन उनकी कहानी दुनिया भर में लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद की बहस को जीवित रखेगी।


निष्कर्ष

जिमी लाई की सजा यह स्पष्ट कर देती है कि हॉन्ग कॉन्ग का संघर्ष केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा है।
प्रश्न अब यह नहीं है कि जिमी लाई दोषी हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या आज की दुनिया में सत्ता से सवाल पूछने की जगह बची है या नहीं

जिमी लाई की लड़ाई जेल में बंद हो सकती है, लेकिन उनकी विरासत आने वाले वर्षों तक स्वतंत्रता की बहस को दिशा देती रहेगी — हॉन्ग कॉन्ग में भी और पूरी दुनिया में भी।


With Washington post Inputs

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