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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Pakistan’s New Regional Strategy: Bangladesh–China–Myanmar Axis and India’s Strategic Challenges

पाकिस्तान का नया क्षेत्रीय दांव: बांग्लादेश–चीन–म्यांमार धुरी और भारत के लिए उभरती चुनौतियाँ

भूमिका: बदलती भू-राजनीति का संकेत

दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र इस समय गहन भू-राजनीतिक पुनर्संरचना के दौर से गुजर रहे हैं। 2020 के बाद वैश्विक शक्ति संतुलन में आए बदलाव—चीन का आक्रामक उदय, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, और क्षेत्रीय संगठनों की निष्क्रियता—ने छोटे और मध्यम देशों को नई रणनीतिक दिशाएँ तलाशने के लिए प्रेरित किया है। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेश, चीन और म्यांमार के साथ एक नए क्षेत्रीय सहयोग तंत्र के निर्माण की कोशिश को देखा जाना चाहिए।

यह पहल केवल कूटनीतिक या आर्थिक नहीं है; इसके भीतर भारत को रणनीतिक रूप से सीमित करने, SAARC जैसी व्यवस्थाओं को अप्रासंगिक बनाने और चीन-केंद्रित क्षेत्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देने का स्पष्ट संकेत निहित है।


बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और क्षेत्रीय समीकरण

2024 में बांग्लादेश में छात्र-नेतृत्व वाले जनआंदोलन के बाद शेख हसीना सरकार का पतन और नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। शेख हसीना के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंध रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुँचे थे—सीमा प्रबंधन, आतंकवाद-विरोधी सहयोग और कनेक्टिविटी इसका आधार थे।

हालाँकि नई सरकार के साथ ढाका की विदेश नीति में “रणनीतिक स्वायत्तता” की खोज अधिक मुखर दिखाई दी। इसी खाली स्थान को पाकिस्तान ने अवसर में बदला। 1971 के युद्ध की स्मृतियों के कारण दशकों तक जमे पाकिस्तान-बांग्लादेश संबंधों में अचानक आई गर्माहट संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित कूटनीति का परिणाम है।


पाकिस्तान-बांग्लादेश संबंधों की पुनर्बहाली

2025 के उत्तरार्ध से दोनों देशों के बीच कई प्रतीकात्मक और ठोस कदम सामने आए—

  • ढाका-कराची के बीच सीधी उड़ानों की बहाली
  • वीज़ा नियमों में ढील
  • चटगांव बंदरगाह पर पाकिस्तानी जहाजों की नियमित आवाजाही
  • रक्षा संपर्कों में उल्लेखनीय वृद्धि

सेना-से-सेना वार्ता, पाकिस्तानी नौसैनिक अभ्यास AMAN-25 में बांग्लादेश की भागीदारी, और उच्च-स्तरीय सैन्य मुलाकातों ने यह संकेत दिया कि सहयोग केवल नागरिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ने की रणनीतिक सोच इसमें स्पष्ट झलकती है।


चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश त्रिपक्षीय तंत्र

इस पूरी प्रक्रिया में चीन एक अदृश्य नहीं, बल्कि केंद्रीय धुरी के रूप में उभरता है। जून 2025 में कुनमिंग में आयोजित पहली चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश त्रिपक्षीय बैठक इस दिशा में निर्णायक कदम थी। बैठक का एजेंडा भले ही व्यापार, जलवायु परिवर्तन, कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे “गैर-विवादास्पद” क्षेत्रों पर केंद्रित रहा हो, किंतु इसके रणनीतिक निहितार्थ कहीं गहरे हैं।

पाकिस्तान ने इसे भविष्य में विस्तारित किए जाने वाले तंत्र के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि बांग्लादेशी नेतृत्व की यह टिप्पणी कि “भारत को छोड़कर क्षेत्रीय गुट बनाना रणनीतिक रूप से संभव है”, भारत के लिए चेतावनी संकेत है।


म्यांमार की एंट्री: चार-देशीय फोरम की परिकल्पना

पाकिस्तान की अगली चाल म्यांमार को इस ढाँचे में शामिल करने की है। म्यांमार पहले से ही चीन के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र में है—2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद यह निर्भरता और गहरी हुई है। चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा (CMEC), बंदरगाह परियोजनाएँ और ऊर्जा निवेश इसे स्पष्ट करते हैं।

चार-देशीय फोरम का विचार—जिसकी पहली बैठक इस्लामाबाद में प्रस्तावित है—औपचारिक रूप से कनेक्टिविटी, आर्थिक सहयोग और स्थिरता पर केंद्रित बताया जा रहा है। किंतु व्यवहार में यह भारत-विरोधी रणनीतिक समन्वय का मंच बन सकता है।

विशेष चिंता का विषय यह है कि चीन चटगांव से ग्वादर तक समुद्री-स्थलीय संपर्क विकसित करना चाहता है, जिससे भारत का पूर्वोत्तर और सिलीगुड़ी कॉरिडोर अप्रत्यक्ष दबाव में आ सकता है।


भारत के लिए उभरती चुनौतियाँ

1. पड़ोसी नीति पर दबाव

भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का सबसे मजबूत स्तंभ बांग्लादेश रहा है। यदि ढाका रणनीतिक संतुलन के नाम पर पाकिस्तान-चीन धुरी की ओर झुकता है, तो यह भारत के लिए कूटनीतिक झटका होगा।

2. हिंद महासागर में चीनी विस्तार

यह पहल चीन की “String of Pearls” रणनीति को और मजबूती दे सकती है। बांग्लादेश का सक्रिय जुड़ाव हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी प्रभाव को नया आयाम देगा।

3. SAARC का क्षरण

SAARC पहले ही लगभग निष्क्रिय है। पाकिस्तान-प्रस्तावित नया तंत्र भारत-रहित क्षेत्रीय व्यवस्था का संकेत देता है, जिससे दक्षिण एशिया का सहयोग ढाँचा विभाजित हो सकता है।

4. सुरक्षा आयाम

पाकिस्तान-चीन रक्षा तकनीक का बांग्लादेश या म्यांमार तक प्रसार भारत के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी सुरक्षा वातावरण को अधिक जटिल बना सकता है।


भारत के लिए रणनीतिक विकल्प

भारत के पास प्रतिक्रिया के लिए विकल्प सीमित नहीं हैं, बशर्ते वे सक्रिय और दीर्घकालिक हों—

  • बांग्लादेश के साथ आर्थिक व जन-केंद्रित सहयोग को पुनर्जीवित करना
  • रोहिंग्या मुद्दे पर व्यावहारिक समाधान में नेतृत्व
  • BIMSTEC और इंडो-पैसिफिक मंचों को मजबूत करना
  • समुद्री कूटनीति और पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी पर विशेष ध्यान

निष्कर्ष: प्रारंभिक संकेत, गहरे प्रभाव

पाकिस्तान का यह नया पैतरा कोई आकस्मिक कदम नहीं है। यह चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा, बांग्लादेश की नई सरकार की स्वायत्तता की खोज और पाकिस्तान की भारत-विरोधी रणनीति का मिश्रण है। म्यांमार को शामिल कर यह गुट बंगाल की खाड़ी से अरब सागर तक फैल सकता है। हालांकि, यह अभी प्रारंभिक चरण में है—बांग्लादेश चुनाव के बाद ही असली तस्वीर साफ होगी। यदि यह गुट बनता है, तो दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बदल जाएगा, और भारत को अपनी पड़ोस नीति में बड़े बदलाव की जरूरत पड़ेगी। क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए सभी पक्षों को सतर्क और संतुलित कदम उठाने होंगे।

भारत के लिए चुनौती केवल विरोध की नहीं, बल्कि संतुलित, आत्मविश्वासी और दूरदर्शी कूटनीति अपनाने की है—ताकि पड़ोस सहयोग का क्षेत्र बना रहे, न कि प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा।



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