सावलकोट हाइड्रो प्रोजेक्ट: जल-रणनीति, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय संकल्प का नया अध्याय
भारत की जल-नीति और ऊर्जा रणनीति लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, कूटनीतिक आपत्तियों और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन साधती रही है। किंतु सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद, मोदी सरकार ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अब विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आत्मनिर्भरता—तीनों पर कोई समझौता नहीं होगा। चिनाब नदी पर प्रस्तावित सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट इसी बदली हुई रणनीतिक सोच का सबसे सशक्त और ठोस प्रमाण बनकर उभरा है।
सरकारी कंपनी एनएचपीसी (NHPC) द्वारा 5,129 करोड़ रुपये के प्रमुख सिविल वर्क पैकेज का टेंडर जारी होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि दशकों से रुके एक राष्ट्रीय स्वप्न को गति देने का निर्णायक क्षण है। यह परियोजना जम्मू-कश्मीर के विकास, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति—तीनों को एक साथ प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
सिंधु जल संधि का निलंबन: सुरक्षा और संप्रभुता का संदेश
1960 में हुई सिंधु जल संधि को लंबे समय तक भारत-पाक संबंधों में स्थिरता का प्रतीक माना गया। इसके तहत भारत को पूर्वी नदियों पर पूर्ण अधिकार मिला, जबकि पश्चिमी नदियों—इंडस, झेलम और चिनाब—पर पाकिस्तान को प्रमुख उपयोग का अधिकार दिया गया। भारत को केवल सीमित गैर-उपभोगीय परियोजनाओं की अनुमति थी।
लेकिन 2025 के पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 निर्दोष पर्यटकों की जान गई, ने इस संतुलन को तोड़ दिया। भारत ने पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती मानते हुए अप्रैल 2025 में सिंधु जल संधि को ‘निलंबित’ कर दिया। यह फैसला स्पष्ट संदेश था—
“आतंक और सहयोग एक साथ नहीं चल सकते।”
इस निलंबन के साथ भारत को पश्चिमी नदियों पर अपनी परियोजनाओं को बिना बाहरी आपत्तियों के आगे बढ़ाने की रणनीतिक स्वतंत्रता मिली। सावलकोट प्रोजेक्ट इसी बदले हुए परिदृश्य का पहला बड़ा और ठोस उदाहरण है।
सावलकोट हाइड्रो प्रोजेक्ट: तकनीक, क्षमता और विस्तार
चिनाब नदी पर स्थित यह परियोजना जम्मू-कश्मीर का सबसे बड़ा हाइड्रो प्रोजेक्ट बनने जा रही है।
मुख्य विशेषताएँ
- कुल क्षमता: 1,856 मेगावाट (MW)
- चरण-1: 1,406 MW
- चरण-2: 450 MW
- स्थान: रामबन जिले के सिधु (Sidhu) गांव के पास
- प्रकार: रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना
- डैम संरचना: 192.5 मीटर ऊँचा RCC (Roller Compacted Concrete) डैम
- कुल अनुमानित लागत: लगभग 22,700 करोड़ रुपये
एनएचपीसी द्वारा जारी 5,129 करोड़ रुपये का टेंडर परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण सिविल वर्क्स को कवर करता है—डाइवर्जन टनल, स्पाइरल टनल, कोफर डैम, एक्सेस रोड्स और अन्य सहायक संरचनाएँ।
निर्माण अवधि लगभग 9 वर्ष तय की गई है, जिसमें मानसून और गैर-मानसून कार्य-योजना को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: कश्मीर के लिए विकास का इंजन
सावलकोट केवल बिजली उत्पादन की परियोजना नहीं है; यह क्षेत्रीय विकास का इंजन है।
- हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार
- स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर—सड़क, संचार और सेवाओं का विस्तार
- जम्मू-कश्मीर की ऊर्जा आत्मनिर्भरता
- राष्ट्रीय ग्रिड में स्वच्छ, नवीकरणीय बिजली की आपूर्ति
यह परियोजना पाकल दुल, किरू और क्वार जैसे अन्य चिनाब बेसिन प्रोजेक्ट्स के साथ मिलकर पूरे क्षेत्र को एक हाइड्रो-एनर्जी कॉरिडोर में बदलने की क्षमता रखती है।
रणनीतिक और भू-राजनीतिक आयाम
सिंधु संधि के दौर में पाकिस्तान अक्सर भारतीय परियोजनाओं पर आपत्तियाँ दर्ज करता रहा, जिससे देरी और अनिश्चितता बनी रही। अब, संधि के निलंबन के बाद, भारत को अपनी जल-रणनीति को राष्ट्रीय हित के अनुसार लागू करने की स्वतंत्रता मिली है।
यह कदम—
- भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करता है
- पाकिस्तान पर रणनीतिक दबाव बढ़ाता है
- यह संदेश देता है कि जल संसाधन भी अब भारत की व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का हिस्सा हैं
निष्कर्ष: एक परियोजना, कई अर्थ
सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट केवल एक बांध या पावर प्लांट नहीं है। यह—
- राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक है
- आतंकवाद के विरुद्ध कठोर नीति का परिणाम है
- और भारत की स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की ओर एक निर्णायक कदम है
जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों में बहती चिनाब अब केवल नदी नहीं, बल्कि विकास, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की धारा बनती जा रही है। सावलकोट उसी धारा का सबसे शक्तिशाली प्रवाह है—जो आने वाले दशकों तक भारत को रोशन करता रहेगा।
(तथ्य NHPC टेंडर दस्तावेजों, स्वराज्य, इंडिया टुडे, आजतक, ग्रेटर कश्मीर, फर्स्टपोस्ट और अन्य विश्वसनीय रिपोर्ट्स पर आधारित, फरवरी 2026 तक की नवीनतम जानकारी के अनुसार।)
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