बांग्लादेश में बीएनपी की ऐतिहासिक जीत और भारत-बांग्लादेश संबंध: एक विस्तृत अकादमिक विश्लेषण
प्रस्तावना
13 फरवरी 2026 को बांग्लादेश की राजनीति में एक निर्णायक परिवर्तन सामने आया, जब Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) ने संसदीय चुनाव में दो-तिहाई से अधिक बहुमत प्राप्त कर सत्ता में वापसी की। लगभग दो दशकों बाद यह परिवर्तन केवल सरकार बदलने की घटना नहीं, बल्कि बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा, वैचारिक संतुलन और विदेश नीति की प्राथमिकताओं में संभावित पुनर्संरचना का संकेत है। संभावित प्रधानमंत्री के रूप में Tarique Rahman का उभार इस परिवर्तन को और भी महत्वपूर्ण बनाता है।
यह चुनाव 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद हुआ, जिसने Sheikh Hasina के नेतृत्व वाली Awami League सरकार का अंत किया। इस राजनीतिक संक्रमण ने दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है—विशेषकर भारत-बांग्लादेश संबंधों के संदर्भ में।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सहयोग और तनाव के आयाम
भारत और बांग्लादेश के संबंध 1971 के मुक्ति संग्राम से गहराई से जुड़े हैं। स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक वर्षों में संबंध सहयोगपूर्ण रहे, किंतु समय के साथ राजनीतिक नेतृत्व और वैचारिक झुकाव के आधार पर उतार-चढ़ाव देखने को मिले।
बीएनपी के पूर्व शासनकाल (1991–1996 और 2001–2006) में भारत-बांग्लादेश संबंध अपेक्षाकृत तनावपूर्ण रहे। इसके प्रमुख कारण थे:
1. सीमा प्रबंधन और अवैध आव्रजन – दोनों देशों के बीच लंबी और जटिल सीमा है, जहाँ घुसपैठ, तस्करी और सीमा-सुरक्षा मुद्दे अक्सर विवाद का कारण बने।
2. जल बंटवारा विवाद – तीस्ता नदी के जल वितरण पर समझौते की अनुपस्थिति तथा फरक्का बैराज से जुड़े मुद्दों ने संबंधों को प्रभावित किया।
3. सुरक्षा चिंताएँ – भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय उग्रवादी समूहों को बांग्लादेशी भूमि से समर्थन मिलने के आरोपों ने अविश्वास बढ़ाया।
4. पाकिस्तान के साथ समीपता की आशंका – बीएनपी पर पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाने के आरोपों ने भारत की सामरिक चिंताओं को बढ़ाया।
इसके विपरीत, 2009 से 2024 तक अवामी लीग शासन में द्विपक्षीय संबंधों में उल्लेखनीय सुधार हुआ। 2015 का Land Boundary Agreement दशकों पुराने एन्क्लेव विवाद के समाधान का प्रतीक बना। इसके अतिरिक्त, ऊर्जा व्यापार, रेल-सड़क संपर्क, अंतर्देशीय जलमार्ग सहयोग और सुरक्षा समन्वय में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
वर्तमान राजनीतिक परिवर्तन और उसकी प्रकृति
बीएनपी की जीत को कई विश्लेषक “राजनीतिक पुनर्संतुलन” के रूप में देख रहे हैं। छात्र आंदोलनों और जन असंतोष ने शासन-प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को प्रमुखता दी। चुनाव परिणाम यह दर्शाते हैं कि बांग्लादेश की जनता लोकतांत्रिक परिवर्तन की आकांक्षी है, परंतु साथ ही स्थिरता और आर्थिक विकास भी चाहती है।
बीएनपी की “बांग्लादेश फर्स्ट” नीति राष्ट्रीय हित, आर्थिक पुनरुद्धार और बहुध्रुवीय विदेश नीति पर बल देती है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि बांग्लादेश भारत, चीन, अमेरिका और अन्य शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाने की कोशिश करेगा।
भारत-बांग्लादेश संबंधों पर संभावित प्रभाव
1. कूटनीतिक चुनौती: प्रत्यर्पण प्रश्न
शेख हसीना के भारत में होने की स्थिति संभावित रूप से एक संवेदनशील मुद्दा बन सकती है। यदि बांग्लादेश नई सरकार औपचारिक प्रत्यर्पण मांग करती है, तो भारत को कानूनी, राजनीतिक और मानवीय पहलुओं का संतुलन साधना होगा। यह द्विपक्षीय विश्वास की परीक्षा ले सकता है।
2. अल्पसंख्यक सुरक्षा और सामाजिक आयाम
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भारत के लिए भावनात्मक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा भारत में जनमत को प्रभावित कर सकती है, जिससे कूटनीतिक संबंधों पर दबाव बढ़ सकता है।
3. सामरिक संतुलन और चीन-पाकिस्तान आयाम
दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती आर्थिक और अवसंरचनात्मक उपस्थिति तथा पाकिस्तान के साथ संभावित समीपता भारत के लिए रणनीतिक चुनौती प्रस्तुत कर सकती है। यदि बीएनपी बहुध्रुवीय विदेश नीति अपनाती है, तो भारत को प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों रणनीतियाँ साथ-साथ चलानी होंगी।
4. आर्थिक सहयोग की अनिवार्यता
बांग्लादेश की विकास दर में हाल के महीनों में गिरावट देखी गई है। निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था, विशेषकर वस्त्र उद्योग, वैश्विक मांग में कमी से प्रभावित हुई है। भारत बांग्लादेश का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। ऊर्जा आपूर्ति, डिजिटल कनेक्टिविटी, सीमा हाट और निवेश सहयोग आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
क्षेत्रीय और भू-राजनीतिक संदर्भ
भारत की “पड़ोसी पहले” नीति का मूल उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता और परस्पर निर्भरता को मजबूत करना है। प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा तारिक रहमान को बधाई संदेश इस बात का संकेत है कि भारत नई सरकार के साथ संवाद और सहयोग जारी रखना चाहता है।
दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन की राजनीति, हिंद महासागर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा, और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे व्यापक आयाम इस द्विपक्षीय संबंध को और जटिल बनाते हैं। बांग्लादेश का भौगोलिक स्थान—पूर्वोत्तर भारत और बंगाल की खाड़ी के बीच—उसे सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
संभावित परिदृश्य
1. सकारात्मक पुनर्संरचना (Constructive Reset)
यदि बीएनपी व्यावहारिकता अपनाते हुए आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को प्राथमिकता देती है, तो संबंधों में स्थिरता और विश्वास बहाल हो सकता है।
2. संतुलित बहुध्रुवीयता
बांग्लादेश भारत और चीन दोनों के साथ संबंध बनाए रखते हुए “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति अपना सकता है। यह भारत के लिए प्रतिस्पर्धात्मक लेकिन प्रबंधनीय स्थिति होगी।
3. अविश्वास की पुनरावृत्ति
यदि सीमा, जल बंटवारा या सुरक्षा मुद्दों पर टकराव बढ़ता है, तो संबंधों में पुनः तनाव उत्पन्न हो सकता है।
नीति-सुझाव
1. संस्थागत संवाद को मजबूत करना – विदेश सचिव स्तर की नियमित वार्ता और संयुक्त आयोग बैठकों को सक्रिय किया जाए।
2. जल-साझेदारी समझौते को प्राथमिकता – तीस्ता समझौते पर प्रगति दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ा सकती है।
3. आर्थिक एकीकरण – विशेष आर्थिक क्षेत्र, डिजिटल भुगतान संपर्क और ऊर्जा ग्रिड कनेक्टिविटी का विस्तार।
4. सांस्कृतिक और शैक्षिक सहयोग – जन-से-जन संपर्क बढ़ाकर राजनीतिक तनाव को संतुलित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
बीएनपी की ऐतिहासिक जीत बांग्लादेश की लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण अध्याय है। यह परिवर्तन भारत-बांग्लादेश संबंधों में अनिश्चितता के साथ-साथ अवसर भी प्रस्तुत करता है।
यदि दोनों देश अतीत की शंकाओं से आगे बढ़कर पारस्परिक हितों पर आधारित व्यावहारिक नीति अपनाते हैं, तो यह दक्षिण एशिया में स्थिरता और समृद्धि का आधार बन सकता है।
परंतु यदि वैचारिक मतभेद और सामरिक प्रतिस्पर्धा हावी होती है, तो संबंधों में जटिलता बढ़ सकती है।
अतः वर्तमान स्थिति को एक “रीसेट” के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए—जहाँ सहयोग, संवेदनशील कूटनीति और आर्थिक साझेदारी भविष्य की दिशा निर्धारित करेंगे।
With BBC Inputs
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