वैश्विक आर्थिक वृद्धि का नया इंजन भारत: IMF आउटलुक 2026 और शक्ति संतुलन में बदलाव
भूमिका: बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था का संकेत
21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक अर्थव्यवस्था एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। लंबे समय तक पश्चिम-केन्द्रित रही वैश्विक आर्थिक शक्ति अब धीरे‑धीरे एशिया की ओर स्थानांतरित हो रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के World Economic Outlook Update, जनवरी 2026 के ताज़ा अनुमान इस संरचनात्मक बदलाव को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं। विश्व की समग्र वृद्धि दर भले ही स्थिर दिखाई दे, पर उसके भीतर का संतुलन तेजी से बदल रहा है—और इस बदलाव के केंद्र में भारत उभरकर सामने आ रहा है।
वैश्विक वृद्धि में भारत की निर्णायक भूमिका
IMF के अनुसार, 2026 में वैश्विक वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर लगभग 3.3% रहने का अनुमान है। यह दर अक्टूबर 2025 के अनुमान से थोड़ी अधिक है, जो इस बात का संकेत देती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था व्यापार नीतियों में अनिश्चितता, भू‑राजनीतिक तनाव और वित्तीय सख्ती के बावजूद लचीलापन बनाए हुए है। इस स्थिरता के पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और उन्नत तकनीकों में निवेश, लक्षित वित्तीय सहायता तथा निजी क्षेत्र की अनुकूलन क्षमता जैसी शक्तियाँ काम कर रही हैं।
इसी वैश्विक परिदृश्य में भारत का योगदान असाधारण रूप से उभरता है। अनुमान है कि 2026 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि में भारत की हिस्सेदारी लगभग 17% होगी, जो अमेरिका (लगभग 9.9%) से कहीं अधिक है। चीन अभी भी 26.6% योगदान के साथ शीर्ष पर बना हुआ है, किंतु भारत और चीन मिलकर विश्व की कुल वृद्धि का लगभग 43.6% संचालित कर रहे हैं। यह तथ्य न केवल एशिया के बढ़ते आर्थिक महत्व को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे मौलिक बदलाव की ओर भी संकेत करता है।
प्रसिद्ध उद्योगपति एलन मस्क द्वारा साझा की गई टिप्पणी—“The balance of power is changing”—इसी व्यापक बदलाव की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।
भारत की घरेलू वृद्धि: गति और आधार
भारत की आंतरिक आर्थिक गति भी इस वैश्विक भूमिका को मजबूत आधार प्रदान करती है। IMF ने कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए भारत की वृद्धि दर 6.4% (कुछ आकलनों में 6.3%) रहने का अनुमान लगाया है, जो उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की औसत वृद्धि दर (लगभग 1.8%) से कहीं अधिक है। इससे भी अधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि 2025 के लिए भारत की वृद्धि दर को 7.3% तक ऊपर संशोधित किया गया है, जो अर्थव्यवस्था की मजबूत अंतर्निहित गति को दर्शाता है।
इस प्रदर्शन के पीछे कई संरचनात्मक कारक हैं—
- जनसांख्यिकीय लाभांश, जिसमें युवा और कार्यशील आबादी की बड़ी हिस्सेदारी शामिल है;
- मजबूत घरेलू मांग, जो वैश्विक मंदी के दौर में भी अर्थव्यवस्था को सहारा देती है;
- बुनियादी ढांचे में निरंतर निवेश, विशेषकर परिवहन, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी में;
- डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता।
इन तत्वों ने मिलकर भारत को न केवल एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनाया है, बल्कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच एक अपेक्षाकृत स्थिर विकास इंजन भी बना दिया है।
उभरती सीमाएँ और संरचनात्मक चुनौतियाँ
फिर भी, इस प्रगति को “पूर्णतः आगे निकलने” की स्थिति मान लेना जल्दबाज़ी होगी। भारत की वृद्धि के भीतर असमानताएँ स्पष्ट हैं। सेवा और आईटी क्षेत्र जहां तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं, वहीं विनिर्माण, कृषि, और विशेष रूप से रोज़गार सृजन अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाए हैं। क्षेत्रीय असंतुलन भी बना हुआ है, जहां कुछ राज्य विकास के लाभों को अधिक आत्मसात कर पा रहे हैं, जबकि अन्य पीछे रह जाते हैं।
इसके अतिरिक्त—
- उच्च बेरोज़गारी और आय‑असमानता सामाजिक‑आर्थिक दबाव पैदा कर सकती हैं;
- वैश्विक व्यापार तनाव, विशेषकर विकसित देशों की संरक्षणवादी नीतियाँ और संभावित अमेरिकी टैरिफ, भारत के निर्यात‑आधारित क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं;
- मुद्रास्फीति नियंत्रण और राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना एक सतत चुनौती है;
- उत्पादकता वृद्धि में ठोस सुधार के बिना दीर्घकालिक उच्च वृद्धि बनाए रखना कठिन होगा।
IMF स्वयं भी भू‑राजनीतिक जोखिमों और AI से जुड़ी अपेक्षाओं के संभावित पुनर्मूल्यांकन को लेकर आगाह करता है, जो भविष्य की वृद्धि संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
निष्कर्ष: अवसर का क्षण और नीति की परीक्षा
समग्र रूप से देखें तो भारत आज न केवल वैश्विक आर्थिक वृद्धि का एक प्रमुख इंजन बन चुका है, बल्कि एशिया‑प्रशांत क्षेत्र के साथ मिलकर विश्व अर्थव्यवस्था के संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। यह उभार ऐतिहासिक अवसर प्रस्तुत करता है—भारत के लिए भी और व्यापक वैश्विक व्यवस्था के लिए भी।
परंतु इस अवसर को समावेशी, नवाचार‑आधारित और टिकाऊ विकास में बदलने के लिए गहरे आंतरिक सुधार, श्रम और विनिर्माण क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन, तथा सतर्क और दूरदर्शी नीतिगत दृष्टिकोण अनिवार्य होंगे। यदि भारत इन चुनौतियों से सफलतापूर्वक पार पा लेता है, तो वह न केवल “तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था” बल्कि वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की धुरी के रूप में भी स्थापित हो सकता है।
With India Today Inputs
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