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End of Hereditary Peers in the House of Lords: A Historic Reform in British Parliamentary Democracy

हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स की सदस्यता का अंत: ब्रिटिश लोकतंत्र के विकास का एक निर्णायक अध्याय ब्रिटेन की संसदीय परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। किंतु इस गौरवपूर्ण परंपरा के भीतर कुछ ऐसे तत्व भी रहे हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ लंबे समय से असंगत माने जाते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख था हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स (Hereditary Peers) की सदस्यता—एक ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत कुलीन परिवारों के सदस्य केवल अपने जन्म के आधार पर संसद के ऊपरी सदन में स्थान प्राप्त करते थे। मार्च 2026 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित Hereditary Peers Bill इस व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके साथ ही सदियों से चली आ रही वह परंपरा समाप्त हो जाएगी जिसके अंतर्गत राजनीतिक शक्ति का एक हिस्सा जन्माधिकार से निर्धारित होता था। यह सुधार न केवल एक संस्थागत परिवर्तन है, बल्कि ब्रिटिश लोकतंत्र के क्रमिक आधुनिकीकरण की उस दीर्घकालिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें सामंती विरासतों को धीरे-धीरे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरू...

UPSC Current Affairs: 30 April 2025

 दैनिक समसामयिकी लेख संकलन व विश्लेषण: 30 अप्रैल 2025

1-यहाँ एक विश्लेषणात्मक लेख प्रस्तुत है, जो UNRWA के ताजा बयान पर आधारित है और UPSC GS पेपर 2 (अंतरराष्ट्रीय संबंध, मानवाधिकार) व GS पेपर 4 (नैतिकता) के दृष्टिकोण से उपयोगी है:


शीर्षक: ग़ाज़ा में UNRWA कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार और ‘ह्यूमन शील्ड’ के रूप में उपयोग – अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून पर एक प्रश्नचिह्न

परिचय:

संयुक्त राष्ट्र की फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए सहायता एजेंसी (UNRWA) ने हाल ही में एक गंभीर आरोप लगाया है कि उसके 50 से अधिक कर्मचारियों को इज़राइली सैन्य हिरासत में शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उन्हें 'मानव ढाल' के रूप में प्रयोग किया गया। यह घटना ग़ाज़ा पट्टी में जारी सैन्य संघर्ष के बीच मानवाधिकारों के व्यापक उल्लंघन की ओर संकेत करती है।


मुख्य तथ्य व घटनाक्रम:

  • UNRWA प्रमुख फिलिप लैजारिनी ने कहा कि कर्मचारियों को हिरासत में लिया गया, कई को जबरन नग्न किया गया और कुछ को बंदी बनाकर सैन्य अभियानों में 'ह्यूमन शील्ड' के रूप में इस्तेमाल किया गया।
  • इज़राइली सेना ने इन आरोपों को खारिज किया है लेकिन स्वतंत्र जांच की मांगें उठ रही हैं।
  • यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब ग़ाज़ा में मानवीय संकट पहले ही चरम पर है और UNRWA की भूमिका विवादों के घेरे में है।

मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन:

  • ‘ह्यूमन शील्ड’ का प्रयोग 1949 के जिनेवा कन्वेंशन के तहत एक युद्ध अपराध है।
  • युद्ध के नियमों (Law of Armed Conflict) के अनुसार, किसी नागरिक या गैर-लड़ाकू व्यक्ति का जबरन सैन्य कार्य में उपयोग अवैध है।
  • कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार, जबरन नग्न करना, और अपमानजनक व्यवहार मानव गरिमा के खिलाफ है और यह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणा-पत्र (UDHR) का भी उल्लंघन है।

नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण:

  • यह कृत्य मानवीय मर्यादा और नैतिकता का उल्लंघन है।
  • यदि संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों को सुरक्षा नहीं मिलती, तो संघर्ष क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप का भविष्य संकट में पड़ सकता है।
  • यह सवाल उठता है कि क्या सैन्य कार्रवाई के नाम पर किसी देश को अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की निष्पक्षता और कर्मचारियों की सुरक्षा को कुचलने का अधिकार है?

राजनयिक और वैश्विक प्रतिक्रिया:

  • UN और कई मानवाधिकार संगठनों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है और स्वतंत्र जांच की मांग की है।
  • इज़राइल और संयुक्त राष्ट्र के संबंधों में यह एक और विवादित बिंदु बन गया है, विशेषकर जब कुछ देशों ने UNRWA की फंडिंग रोक दी है।
  • इस घटना से इज़राइल की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंच सकता है और न्यायिक जवाबदेही की मांगें तेज हो सकती हैं।

निष्कर्ष:

UNRWA के कर्मचारियों के साथ ऐसा व्यवहार न केवल मानवीय मूल्यों का हनन है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो यह मामला भविष्य में और अधिक जटिलताओं को जन्म देगा और अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रासंगिकता को कमजोर करेगा।


UPSC मुख्य परीक्षा से संबंधित संभावित प्रश्न:

  1. हाल ही में ग़ाज़ा संघर्ष में UNRWA कर्मचारियों के साथ हुए व्यवहार को लेकर उत्पन्न अंतरराष्ट्रीय विवाद को मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित कीजिए।
  2. युद्ध में नैतिक सीमाओं और सैन्य रणनीतियों के संतुलन पर चर्चा कीजिए।

स्रोत:

  • United Nations Relief and Works Agency for Palestine Refugees in the Near East (UNRWA) द्वारा 29 अप्रैल 2025 को जारी आधिकारिक बयान।
  • रिपोर्ट कवरेज: Al Jazeera और The Guardian की 29-30 अप्रैल 2025 की समाचार रिपोर्टें।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून: 1949 का जिनेवा कन्वेंशन, विशेषकर सामान्य अनुच्छेद 3 और अतिरिक्त प्रोटोकॉल-I।
  • मानवाधिकार का वैश्विक सन्दर्भ: Universal Declaration of Human Rights (UDHR), 1948

2-भारत का अंतरिक्षीय गौरव: शुभांशु शुक्ला की 'Axiom-4' मिशन के साथ नई उड़ान
(UPSC GS-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी | अंतरराष्ट्रीय संबंध | अंतरिक्ष कूटनीति)


प्रस्तावना:

29 मई 2025 को भारत एक बार फिर अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने जा रहा है। इस बार नायक हैं शुभांशु शुक्ला, जो Axiom-4 मिशन के साथ अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की ओर उड़ान भरने को तैयार हैं। यह न केवल भारत के लिए एक वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि अंतरिक्ष कूटनीति के क्षेत्र में भी एक संभावित मील का पत्थर हो सकता है।


Axiom-4 मिशन: परिचय

  • Axiom Space एक निजी अमेरिकी कंपनी है जो वाणिज्यिक अंतरिक्ष मिशनों का संचालन करती है।
  • Axiom-4 मिशन में अंतरिक्ष यात्री ISS पर पहुँचेंगे जहाँ वे विज्ञान, प्रौद्योगिकी और चिकित्सा से जुड़े प्रयोग करेंगे।
  • इस मिशन में शुभांशु शुक्ला का चयन भारत की वैश्विक अंतरिक्ष भूमिका को भी रेखांकित करता है।

शुभांशु शुक्ला की भूमिका:

  • मिशन में शुक्ला का प्रमुख योगदान होगा अंतरिक्ष स्वास्थ्य (Space Health), जीवविज्ञान प्रयोग, और उन्नत तकनीकी परीक्षण
  • उनकी पृष्ठभूमि रक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान दोनों से जुड़ी हुई है, जिससे वे मानव अंतरिक्ष उड़ानों के लिए उपयुक्त उम्मीदवार बनते हैं।

भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?

  1. विज्ञान और प्रौद्योगिकी में प्रगति:
    इस मिशन से भारत को अंतरिक्ष जैविक अनुसंधान, माइक्रोग्रैविटी प्रभाव और मेडिकल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में अनुभव मिलेगा।

  2. अंतरिक्ष कूटनीति (Space Diplomacy):
    भारत, अमेरिका जैसे देशों के साथ साझेदारी में अंतरिक्ष अभियानों में भागीदारी कर रहा है। यह वैश्विक मंच पर भारत की वैज्ञानिक साख को मजबूत करता है।

  3. निजी क्षेत्र को बढ़ावा:
    Axiom जैसी निजी कंपनियों के साथ सहयोग, भारत के अंतरिक्ष निजीकरण की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है – यह भारत की Gaganyaan योजना से भी जुड़ा हुआ कदम हो सकता है।

  4. युवा पीढ़ी को प्रेरणा:
    शुभांशु शुक्ला जैसे युवा अंतरिक्ष यात्री STEM शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देंगे, जो भविष्य की वैज्ञानिक पीढ़ियों को प्रोत्साहित करेगा।


चुनौतियाँ और रणनीतिक दृष्टिकोण:

  • भारत को चाहिए कि वह ऐसी भागीदारी को दीर्घकालिक सहयोग में बदले और अंतरिक्ष नियमों व नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाए।
  • इसके अलावा, ‘Global South’ की आवाज़ बनते हुए, भारत विकासशील देशों को भी अंतरिक्ष तकनीक सुलभ कराने की नीति अपना सकता है।

निष्कर्ष:

शुभांशु शुक्ला की Axiom-4 मिशन में भागीदारी महज़ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, यह भारत की बढ़ती वैश्विक वैज्ञानिक उपस्थिति, अंतरिक्ष कूटनीतिक दृष्टिकोण, और STEM नेतृत्व की दिशा में अगला कदम है। यह मिशन हमें "धरती से सितारों तक" के उस स्वप्न की याद दिलाता है, जिसे भारत अब साकार कर रहा है।


UPSC उत्तरलेखन के लिए मुख्य बिंदु:

  • Axiom-4: अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र की भूमिका
  • Space Diplomacy में भारत की रणनीति
  • अंतरिक्ष में विज्ञान, स्वास्थ्य और तकनीक की प्रासंगिकता
  • युवा नेतृत्व और STEM शिक्षा के लिए प्रेरणा स्रोत

यह लेख निम्नलिखित स्रोतों और प्रमाणिक सूचनाओं पर आधारित है:

प्रमुख स्रोत:

  1. Axiom Space की आधिकारिक वेबसाइट

    • Axiom-4 मिशन, चालक दल की संरचना और अनुसंधान उद्देश्यों की जानकारी।
  2. NASA की प्रेस रिलीज और ISS मिशन डिटेल्स

    • अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर नियोजित प्रयोगों और साझेदार देशों के योगदान की जानकारी।
  3. भारत सरकार / ISRO से जुड़े समाचार स्रोत:

    • Press Information Bureau (PIB): (https://pib.gov.in)
    • ISRO की भागीदारी और भारत की अंतरिक्ष नीति संबंधी घोषणाएँ।
  4. प्रमुख समाचार मीडिया पोर्टल्स:

    • The Hindu, Times of India, Indian Express (अप्रैल 2025 की रिपोर्टिंग)
    • शुभांशु शुक्ला की चयन प्रक्रिया, मिशन की तारीख (29 मई 2025), और भारत के दृष्टिकोण की जानकारी।
  5. Space.com और SpaceNews जैसी अंतरराष्ट्रीय विज्ञान रिपोर्टिंग साइट्स

    • मिशन उद्देश्यों, तकनीकी परीक्षण और वैश्विक भागीदारी की विश्लेषणात्मक रिपोर्टें।

3-शीर्षक: STEM शिक्षा: भारत के नवोन्मेषी भविष्य का स्वप्न और संकल्प

“जो राष्ट्र विज्ञान, तकनीक और नवाचार की भाषा बोलता है, वही 21वीं सदी का नेतृत्व करता है।” यह विचार आज के भारत के लिए एक मंत्र है, जो न केवल हमारी शैक्षिक प्रणाली को प्रेरित करता है, बल्कि हमारे युवाओं को वैश्विक मंच पर अग्रणी बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। STEM (Science, Technology, Engineering, Mathematics) शिक्षा केवल किताबों का बोझ या कक्षाओं का पाठ्यक्रम नहीं है; यह एक ऐसी चिंगारी है जो जिज्ञासा को प्रज्वलित करती है, समस्याओं का समाधान सिखाती है और नवाचार का साहस देती है।

भारत का युवा, भारत का सपना

भारत एक युवा राष्ट्र है, जहाँ 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इसे साकार करने के लिए हमें अपने युवाओं को सही औज़ार देने होंगे। STEM शिक्षा वह सेतु है, जो हमारे युवाओं को पारंपरिक नौकरियों से हटाकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष अनुसंधान, ब्लॉकचेन, जैवप्रौद्योगिकी और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे भविष्य के क्षेत्रों तक ले जाएगा।  

वर्तमान परिदृश्य: प्रगति और चुनौतियाँ

भारत सरकार ने STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारंभिक स्तर पर ही अनुभव-आधारित और अनुसंधान-प्रधान शिक्षा पर जोर दिया है। अटल इनोवेशन मिशन और INSPIRE कार्यक्रम ने स्कूलों में टिंकरिंग लैब्स और विज्ञान प्रदर्शनियों को प्रोत्साहित किया है। निजी क्षेत्र भी कोडिंग बूटकैंप्स, रोबोटिक्स वर्कशॉप्स और स्टार्टअप इनक्यूबेटर्स के माध्यम से योगदान दे रहा है।  

लेकिन, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। ग्रामीण भारत में अधिकांश स्कूलों में प्रयोगशालाएँ, इंटरनेट या प्रशिक्षित शिक्षक तक नहीं हैं। UNESCO की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में STEM क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी मात्र 28% है, जो सामाजिक रूढ़ियों और अवसरों की कमी को दर्शाता है। इसके अलावा, शहरी-ग्रामीण डिजिटल खाई और क्षेत्रीय असमानताएँ भी STEM शिक्षा के प्रसार में बाधा हैं।  

STEM क्यों है भारत का भविष्य?

आज भारत की अर्थव्यवस्था का भविष्य तकनीक पर टिका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस जैसे क्षेत्र न केवल रोजगार सृजन कर रहे हैं, बल्कि स्वास्थ्य, कृषि और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला रहे हैं। इसरो की मंगलयान और चंद्रयान जैसी उपलब्धियाँ STEM की शक्ति का प्रतीक हैं। जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा और डिजिटल आत्मनिर्भरता जैसे वैश्विक मुद्दों का समाधान भी STEM-दक्ष नागरिकों के बिना संभव नहीं।  

एक रोचक उदाहरण लें: कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने स्वदेशी वैक्सीन विकसित कीं और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे CoWIN के माध्यम से टीकाकरण अभियान चलाया। यह STEM की ताकत थी, जिसने विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग को एकजुट कर एक राष्ट्रीय संकट का सामना किया।  

चुनौतियों का समाधान: एक रोडमैप

STEM शिक्षा को भारत के कोने-कोने तक ले जाने के लिए हमें ठोस और रचनात्मक कदम उठाने होंगे:  

शिक्षकों का सशक्तिकरण: शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण विधियों, डिजिटल टूल्स और प्रायोगिक शिक्षण का प्रशिक्षण देना होगा। उदाहरण के लिए, शिक्षक बच्चों को सौर ऊर्जा मॉडल बनाना सिखाएँ या स्थानीय समस्याओं के लिए तकनीकी समाधान खोजने को प्रेरित करें।  

प्रयोगशालाएँ और नवाचार केंद्र: हर स्कूल में अटल टिंकरिंग लैब्स जैसी सुविधाएँ होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल साइंस वैन और डिजिटल क्लासरूम इस कमी को पूरा कर सकते हैं।  

लैंगिक समावेशन: लड़कियों को STEM में प्रोत्साहित करने के लिए छात्रवृत्तियाँ, मेंटरशिप प्रोग्राम और प्रेरक कहानियाँ जरूरी हैं। कल्पना चावला, टेस्सी थॉमस जैसी महिला वैज्ञानिकों की कहानियाँ स्कूल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनें।  

उद्योग-शिक्षा साझेदारी: टेक कंपनियाँ और स्टार्टअप्स को स्कूलों के साथ मिलकर इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट-आधारित लर्निंग और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू करने चाहिए।  

स्थानीय भाषाओं में सामग्री: STEM शिक्षा को हिंदी, तमिल, बंगाली जैसी भाषाओं में उपलब्ध कराना होगा, ताकि भाषा कोई बाधा न बने।

एक प्रेरक कहानी

केरल के एक छोटे से गाँव की प्रिया की कहानी प्रेरणादायक है। एक सरकारी स्कूल की छात्रा, प्रिया ने अटल टिंकरिंग लैब में सौर ऊर्जा से चलने वाला एक सस्ता वाटर प्यूरीफायर बनाया, जो उसके गाँव की पीने के पानी की समस्या का समाधान बन गया। प्रिया जैसी लाखों प्रतिभाएँ भारत में हैं, बस उन्हें सही मंच और संसाधन चाहिए।  

निष्कर्ष: नवाचार का संकल्प

STEM शिक्षा भारत के लिए एक विकल्प नहीं, बल्कि एक संकल्प है। यह केवल डिग्रियाँ या नौकरियाँ देने का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच है जो तर्क, रचनात्मकता और साहस को पंख देती है। अगर भारत को 2047 तक ‘विकसित राष्ट्र’ बनना है, तो STEM को हर बच्चे के सपनों का हिस्सा बनाना होगा। आइए, हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जहाँ हर बच्चा वैज्ञानिक बनने का सपना देखे, हर गाँव नवाचार का केंद्र बने, और हर युवा वैश्विक मंच पर भारत का परचम लहराए।

 उक्त संपादकीय लेख "STEM शिक्षा: भारत के नवोन्मेषी भविष्य का स्वप्न और संकल्प" के आधार पर संभावित UPSC प्रश्न दिए जा रहे हैं, जो प्रारंभिक परीक्षा (MCQs) और मुख्य परीक्षा (लघु/विस्तृत उत्तर) दोनों के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं। ये प्रश्न लेख के मुख्य विचारों, STEM शिक्षा की चुनौतियों, नीतियों और भारत के भविष्य से संबंधित हैं।

प्रारंभिक परीक्षा (MCQs)

प्रश्न:1 निम्नलिखित में से कौन-सा कार्यक्रम भारत में STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया है?
a) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020
b) अटल इनोवेशन मिशन
c) INSPIRE कार्यक्रम
d) उपरोक्त सभी  उत्तर: d) उपरोक्त सभी  

प्रश्न:2 UNESCO की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में STEM क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी कितनी है?
a) 15%
b) 28%
c) 40%
d) 50%  उत्तर: b) 28%  

प्रश्न:3 भारत में STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ‘अटल टिंकरिंग लैब्स’ किस मिशन के तहत स्थापित की गई हैं?
a) डिजिटल इंडिया
b) स्किल इंडिया
c) अटल इनोवेशन मिशन
d) मेक इन इंडिया  उत्तर: c) अटल इनोवेशन मिशन  

प्रश्न:4 निम्नलिखित में से कौन-सा क्षेत्र STEM शिक्षा पर निर्भर नहीं है?
a) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
b) अंतरिक्ष अनुसंधान
c) पारंपरिक हस्तशिल्प
d) जैवप्रौद्योगिकी  उत्तर: c) पारंपरिक हस्तशिल्प

मुख्य परीक्षा (लघु/विस्तृत उत्तर)

1: भारत में STEM शिक्षा की वर्तमान स्थिति और चुनौतियों का विश्लेषण करें। इसे ग्रामीण और लैंगिक समावेशन के दृष्टिकोण से कैसे मजबूत किया जा सकता है? (150 शब्द)  

2: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए क्या प्रावधान किए हैं? भारत के नवोन्मेषी भविष्य के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा करें। (250 शब्द)  

3: STEM शिक्षा भारत की आर्थिक प्रगति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? उदाहरणों के साथ इसकी भूमिका का मूल्यांकन करें। (250 शब्द)  

4: भारत में STEM शिक्षा को स्कूल स्तर पर रुचिकर और व्यावहारिक बनाने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? शिक्षक प्रशिक्षण और उद्योग-शिक्षा समन्वय की भूमिका पर प्रकाश डालें। (150 शब्द)  

5: लैंगिक असमानता STEM शिक्षा में एक प्रमुख चुनौती है। इस असमानता को कम करने के लिए भारत सरकार और समाज द्वारा उठाए जा सकने वाले कदमों पर चर्चा करें। (250 शब्द)  

6: "STEM शिक्षा केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि तार्किक और रचनात्मक सोच का आधार है।" इस कथन के संदर्भ में भारत के युवाओं के लिए STEM शिक्षा की आवश्यकता पर प्रकाश डालें। (200 शब्द)  

7: भारत के डिजिटल आत्मनिर्भरता और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों से निपटने में STEM शिक्षा की भूमिका का मूल्यांकन करें। इसे प्रभावी बनाने के लिए सुझाव दें। (250 शब्द)

निबंध प्रश्न

1: "STEM शिक्षा: भारत के विकसित राष्ट्र बनने का आधार"  
2: "युवा भारत, नवोन्मेषी भारत: STEM शिक्षा की भूमिका"  
3: "लैंगिक समावेशन और STEM: भारत के भविष्य की नींव"

साक्षात्कार (UPSC Personality Test) के लिए संभावित प्रश्न

1: भारत में STEM शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आप क्या नवाचार सुझाएंगे, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए?  

2: STEM क्षेत्रों में महिलाओं की कम भागीदारी के सामाजिक और आर्थिक कारण क्या हैं? इसे कैसे बदला जा सकता है?  

3: क्या आपको लगता है कि भारत की शिक्षा प्रणाली नवाचार को पर्याप्त प्रोत्साहन दे रही है? STEM के संदर्भ में अपने विचार साझा करें।  

4:यदि आप एक नीति निर्माता हों, तो STEM शिक्षा को स्कूल स्तर पर लागू करने के लिए आपकी प्राथमिकताएँ क्या होंगी?

नोट: ये प्रश्न UPSC की प्रकृति को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं, जो तथ्यात्मक जानकारी, विश्लेषणात्मक सोच, और समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण की मांग करते हैं। 

4-शीर्षक: जातिगत जनगणना पर केंद्र सरकार का निर्णय: सामाजिक न्याय की ओर एक महत्वपूर्ण कदम

प्रस्तावना:

हाल ही में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को संबोधित करते हुए घोषणा की कि केंद्र सरकार ने अगली जनगणना में जातिगत गणना को शामिल करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय सामाजिक न्याय, नीति निर्माण और समावेशी विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है।

पृष्ठभूमि:

भारत में आखिरी बार पूर्ण जातिगत जनगणना 1931 में हुई थी। उसके बाद से केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों की गणना होती रही है। हालांकि 2011 में सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) की गई थी, परंतु उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।

फैसले का महत्व:

  1. नीति निर्माण में सहायता:
    जातिगत आंकड़े उपलब्ध होने से सरकार को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लक्षित वर्गों तक प्रभावी रूप से पहुँचाने में मदद मिलेगी।

  2. सामाजिक न्याय की स्थापना:
    यह कदम वंचित और पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति को उजागर करेगा, जिससे उनके अधिकारों और संसाधनों में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस नीति बनाई जा सकेगी।

  3. राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पुनः मूल्यांकन:
    आंकड़ों के आधार पर राजनीतिक आरक्षण और प्रतिनिधित्व को अधिक न्यायसंगत बनाया जा सकता है।

संभावित चुनौतियाँ:

  • राजनीतिक विरोध और संदेह:
    कुछ वर्ग इसे सामाजिक विभाजन या तुष्टिकरण की राजनीति के रूप में देख सकते हैं।

  • तकनीकी और प्रशासनिक जटिलताएँ:
    जातियों की व्यापकता और उनकी उप-श्रेणियों को वर्गीकृत करना प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

  • डेटा की गोपनीयता और उपयोग:
    संवेदनशील जातिगत आंकड़ों का दुरुपयोग और लीक होने की आशंका भी चिंताजनक है।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण (UPSC GS पेपर 2):

यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में निहित सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को बल देता है। यह केंद्र और राज्य सरकारों को साक्ष्य आधारित निर्णय प्रक्रिया अपनाने की दिशा में प्रेरित करेगा। साथ ही यह बहुलतावादी लोकतंत्र को मजबूत करने और सबका साथ, सबका विकास के सिद्धांत को व्यवहारिक स्वरूप देने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

निष्कर्ष:

केंद्र सरकार का जातिगत जनगणना से जुड़ा यह निर्णय सामाजिक समावेशन और न्याय आधारित शासन की ओर एक महत्वपूर्ण पहल है। यह न केवल आंकड़ों की पारदर्शिता बढ़ाएगा बल्कि वंचित वर्गों की आकांक्षाओं को नीति निर्माण की मुख्यधारा में लाने का अवसर प्रदान करेगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस प्रक्रिया को गोपनीयता, निष्पक्षता और उद्देश्यपरकता के साथ कैसे लागू करती है।

5-शीर्षक: छह माह के अंतरिक्ष मिशन के बाद चीन के तीन अंतरिक्ष यात्री सफलतापूर्वक पृथ्वी लौटे – वैश्विक अंतरिक्ष दौड़ में चीन की मजबूत उपस्थिति

प्रस्तावना:

30 अप्रैल 2025 को चीन के तीन अंतरिक्ष यात्री (Taikonauts) अपने छह माह लंबे अंतरिक्ष मिशन के बाद सफलतापूर्वक पृथ्वी लौट आए। यह मिशन चीन के "तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन" (Tiangong Space Station) से जुड़ा हुआ था, जो चीन की महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष परियोजना का केंद्रबिंदु है। यह घटना न केवल चीन की तकनीकी क्षमता का परिचायक है, बल्कि यह उसके 'महाशक्ति बनने की अंतरिक्ष नीति' की दिशा में एक ठोस कदम भी है।

मुख्य बिंदु:

  1. तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन:

    • यह स्टेशन चीन की एकमात्र मानवयुक्त अंतरिक्ष प्रयोगशाला है।
    • इसे 2022 में पूर्ण रूप से चालू किया गया था और यह अब अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के बाद एकमात्र मानवयुक्त दीर्घकालिक स्टेशन है।
  2. मिशन का विवरण:

    • इस मिशन के तहत अंतरिक्ष यात्री Tang Hongbo, Tang Shengjie और Jiang Xinlin शामिल थे।
    • उन्होंने विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोग, बाह्य मरम्मत कार्य, और चिकित्सा परीक्षणों को अंजाम दिया।
  3. रणनीतिक महत्व:

    • यह मिशन चीन के दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष अभियान का हिस्सा है।
    • चीन ने 2045 तक एक प्रमुख 'अंतरिक्ष महाशक्ति' बनने का लक्ष्य रखा है।
  4. वैश्विक प्रभाव:

    • चीन, अमेरिका और रूस के बाद तीसरा ऐसा देश बन गया है, जिसके पास दीर्घकालिक मानवयुक्त स्टेशन है।
    • वह अन्य विकासशील देशों को भी 'स्पेस डिप्लोमेसी' के तहत सहयोग प्रदान कर रहा है।
  5. भारत के लिए संकेत:

    • भारत को अपने गगनयान मिशन की गति को तेज करना होगा ताकि वह मानव अंतरिक्ष उड़ान की क्षमता में चीन के समकक्ष बन सके।
    • वैश्विक भू-राजनीति में अंतरिक्ष अब एक रणनीतिक और कूटनीतिक हथियार बनता जा रहा है।

निष्कर्ष:

चीन के अंतरिक्ष यात्रियों की सफल वापसी न केवल वैज्ञानिक सफलता है बल्कि यह उसके वैश्विक प्रभाव और रणनीतिक क्षमता का प्रतीक भी है। यह घटना भारत सहित अन्य उभरते देशों के लिए प्रेरणा भी है और चुनौती भी, कि वे इस 'नई अंतरिक्ष दौड़' में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं।


श्रोत:

  • Xinhua News Agency, 30 अप्रैल 2025: "Three Chinese astronauts return to Earth after six-month Tiangong mission"
  • CGTN (China Global Television Network), 30 अप्रैल 2025
  • Space.com, April 2025 Report on Tiangong Mission Return


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Women’s Reservation Bill Defeat in Lok Sabha 2026: Constitutional Amendment Fails, Setback for Modi Government

महिला आरक्षण, परिसीमन और लोकतंत्र की परीक्षा: संसद में पराजय के मायने भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं, जब संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं रह जाती, बल्कि राजनीतिक शक्ति, संघीय संतुलन और संवैधानिक नैतिकता की वास्तविक परीक्षा का केंद्र बन जाती है। हाल ही में लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 की पराजय ऐसा ही एक निर्णायक क्षण है—जहां एक ओर महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का वादा था, तो दूसरी ओर परिसीमन के जरिए सत्ता संतुलन बदलने की आशंकाएं। यह घटना केवल एक विधेयक की हार नहीं, बल्कि उस सहमति की विफलता है, जो किसी भी बड़े संवैधानिक परिवर्तन के लिए अनिवार्य होती है। राजनीतिक इच्छाशक्ति बनाम संस्थागत सहमति प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने इस विधेयक को “नारी सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम” बताया। सरकार का तर्क था कि 33% महिला आरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए सीटों का पुनर्गठन और परिसीमन आवश्यक है। किन्तु समस्या इस उद्देश्य में नहीं, बल्कि इसके साधनों में निहित थी। विपक्ष ने इस प्रस्ताव को एक व्यापक राजनीतिक परियोजना के रूप में देखा,...

US-Iran Nuclear Deal Claim: Trump Says Tehran May Hand Over Enriched Uranium After Ceasefire

अमेरिका-ईरान परमाणु समझौता: सीजफायर के बाद ट्रंप का दावा—ईरान सौंप सकता है संवर्धित यूरेनियम अप्रैल 2026 के इस जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में मध्य पूर्व एक बार फिर वैश्विक शक्ति-संतुलन की कसौटी बनकर उभरा है। लगभग दो महीने तक चले अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच भीषण संघर्ष, उसके बाद घोषित दो सप्ताह के अस्थायी संघर्षविराम, और अब उसके समाप्त होते ही उभरते नए दावे—ये सभी घटनाएं केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने वाली हैं। इसी संदर्भ में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किया गया “न्यूक्लियर डस्ट” संबंधी दावा चर्चा के केंद्र में है, जिसने कूटनीति, सुरक्षा और परमाणु राजनीति के नए आयाम खोल दिए हैं। “न्यूक्लियर डस्ट” का अर्थ और राजनीतिक संकेत ट्रंप द्वारा प्रयुक्त शब्द “न्यूक्लियर डस्ट” कोई तकनीकी शब्द नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है। इसका आशय ईरान के उस संवर्धित यूरेनियम भंडार से है, जो उसकी परमाणु क्षमता का मूल आधार रहा है। यदि वास्तव में ईरान इस सामग्री को सौंपने के लिए सहमत हुआ है, तो यह केवल एक सामरिक समझौता नहीं, बल्कि उसकी परमाणु नीति में एक ऐतिहासिक म...

Women Reservation & Delimitation Bills 2026: A Turning Point in India’s Democratic Representation

लोकसभा में नया सामाजिक अनुबंध: प्रतिनिधित्व, संघवाद और राजनीति का पुनर्संतुलन नई दिल्ली के सत्ता-गलियारों में आज जो कुछ घटित हो रहा है, वह केवल तीन विधेयकों की औपचारिक प्रस्तुति भर नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप में एक संभावित संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत है। लोकसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को प्रभावी बनाने और सीटों के पुनर्विन्यास हेतु प्रस्तुत प्रस्ताव, प्रतिनिधित्व के प्रश्न को एक नए आयाम में स्थापित करते हैं—जहाँ न्याय, जनसंख्या, और संघीय संतुलन एक-दूसरे से टकराते भी हैं और पूरक भी बनते हैं। प्रतिनिधित्व का विस्तार या शक्ति का पुनर्वितरण? सरकार द्वारा प्रस्तावित सीटों का विस्तार—543 से बढ़ाकर संभावित 850—पहली दृष्टि में लोकतांत्रिक समावेशन की दिशा में एक प्रगतिशील कदम प्रतीत होता है। तर्क स्पष्ट है: यदि महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करना है, तो मौजूदा सीटों में कटौती किए बिना समग्र संख्या बढ़ाना अधिक न्यायसंगत होगा। परंतु यह विस्तार केवल संख्यात्मक नहीं है; यह सत्ता-संतुलन के पुनर्निर्धारण का माध्यम भी बन सकता है। परिसीमन की प्रक्रिया, जो जनसंख्या के आधार ...

Hormuz Strait Blockade 2026: US-Iran Tensions Escalate, Global Oil Supply and Maritime Security at Risk

होर्मूज की नाकाबंदी: समुद्री भू-राजनीति का विस्फोटक क्षण पश्चिम एशिया की उथल-पुथल भरी भू-राजनीति एक बार फिर वैश्विक व्यवस्था के केंद्र में आ खड़ी हुई है। में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी की शुरुआत ने न केवल क्षेत्रीय तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन को भी गंभीर चुनौती दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति के निर्देश पर उठाया गया यह कदम उस विफल कूटनीति का परिणाम है, जिसने इस्लामाबाद में हुए वार्ताओं के बावजूद किसी स्थायी समाधान का मार्ग प्रशस्त नहीं किया। रणनीतिक जलडमरूमध्य का सैन्यीकरण होर्मूज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी है, आज सैन्य प्रतिस्पर्धा का मंच बन गया है। अमेरिका द्वारा युद्धपोतों, एयरक्राफ्ट कैरियर्स और लड़ाकू विमानों की तैनाती इस बात का संकेत है कि यह केवल “नौवहन की स्वतंत्रता” सुनिश्चित करने का प्रयास नहीं, बल्कि ईरान पर अधिकतम दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। ईरान के लिए यह जलडमरूमध्य उसकी सामरिक ताकत का प्रतीक है, जबकि अमेरिका के लिए यह वैश्विक समुद्री व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न। यह टकराव उस व्याप...

India’s Landmark Electoral Reforms 2026: Delimitation, Lok Sabha Expansion & Women’s Reservation Explained

भारत में ऐतिहासिक चुनावी सुधार 2026: परिसीमन, लोकसभा विस्तार और 33% महिला आरक्षण का पूरा विश्लेषण भारतीय लोकतंत्र समय-समय पर ऐसे निर्णायक मोड़ों से गुजरता रहा है, जब संस्थागत ढांचे को बदलती सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्गठित करने की आवश्यकता सामने आती है। वर्ष 2026 में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत तीन महत्वपूर्ण विधेयक—परिसीमन प्रक्रिया में परिवर्तन, लोकसभा की सदस्य संख्या का विस्तार, और महिला आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन—इसी क्रम में एक व्यापक संरचनात्मक पुनर्संतुलन का संकेत देते हैं। ये प्रस्ताव केवल तकनीकी सुधार नहीं हैं, बल्कि प्रतिनिधित्व, संघीय संतुलन और लोकतांत्रिक समावेशन के प्रश्नों को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास भी हैं। सबसे प्रमुख प्रस्ताव लोकसभा की सदस्य संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करने का है। यह विस्तार अपने आप में अभूतपूर्व है और इसका सीधा संबंध संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने से है। यह स्पष्ट करता है कि सरकार महिला आरक्षण को प्रतीकात्मक स्तर से आगे बढ़ाकर वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण के रूप में स्थापित करना चाहती है। यदि यह प्रस...

Strait of Hormuz Crisis 2026: Impact on Global Energy & India

अमेरिका–ईरान गतिरोध और होर्मुज़ का संकट: ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीति और रणनीतिक विवेक की परीक्षा अप्रैल 2026 का तीसरा सप्ताह वैश्विक भू-राजनीति में एक बार फिर उस मुहाने पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ युद्ध और कूटनीति के बीच की रेखा धुंधली पड़ गई है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान में वार्ता के लिए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भेजने की घोषणा और उसके तुरंत बाद तेहरान का दोटूक इनकार—यह केवल एक विफल संवाद नहीं, बल्कि गहरे अविश्वास की परिणति है। इस बीच, Strait of Hormuz (होर्मुज़ जलडमरूमध्य) का पुनः बंद होना उस वैश्विक ऊर्जा तंत्र को झकझोर रहा है, जिस पर आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं टिकी हुई हैं। कूटनीति की सीमाएँ और शक्ति-राजनीति का उभार इस संकट की जड़ें केवल परमाणु कार्यक्रम या आर्थिक प्रतिबंधों तक सीमित नहीं हैं; यह उस व्यापक शक्ति-संतुलन का प्रश्न है, जिसमें अमेरिका अपना वैश्विक नेतृत्व बचाए रखना चाहता है और ईरान अपनी क्षेत्रीय स्वायत्तता। वाशिंगटन का रुख: अमेरिका होर्मुज़ को एक "तकनीकी मुद्दा" मानकर इसे परमाणु वार्ता से अलग रखना चाहता है। उसका उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति को निर्बाध रखना है। तेहरान क...

Asha Bhosle: The Melodic Queen of Indian Music – Life, Iconic Songs & Timeless Legacy

आशा भोसले: सुरों की मल्लिका और भारतीय संगीत की अमर आवाज़ | Life, Songs, Legacy सुरों की मल्लिका, भारतीय संगीत की अमर आवाज़—आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रहीं। 12 अप्रैल 2026 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। थकान और फेफड़ों के संक्रमण के कारण 11 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती होने के एक दिन बाद मल्टीपल ऑर्गन फेलियर से उनका निधन हो गया। उनकी यह विदाई संगीत जगत के लिए एक युग का अंत है, जिसकी मधुरता ने आठ दशकों से अधिक समय तक करोड़ों भारतीय दिलों को छुआ और विश्व पटल पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। वे स्वरसम्राट दिनानाथ मंगेशकर की पुत्री और स्वरकोकिला लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं। संगीत परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनका सफर आसान नहीं था। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण उन्होंने बचपन से ही गायकी की राह अपनाई। उनका पहला गाना 1948 में फिल्म 'चुनरिया' का "सावन आया" था, लेकिन असली पहचान उन्हें 1950-60 के दशक में मिली। शुरू में बहनों की छाया में छोटी-छोटी भूमिकाओं और स...

Pariksha Pe Charcha 2026: PM Modi’s Motivational Message for Students on Exams, Skills, Balance & Success

परीक्षा पे चर्चा 2026: परीक्षा से आगे जीवन की तैयारी का राष्ट्रीय संवाद परीक्षा का समय आते ही देश के करोड़ों छात्रों के मन में एक ही सवाल गूंजने लगता है— क्या मैं सफल हो पाऊँगा? इसी प्रश्न, इसी तनाव और इसी अनिश्चितता को संवाद और आत्मविश्वास में बदलने का मंच है ‘परीक्षा पे चर्चा’ । 6 फरवरी 2026 को आयोजित परीक्षा पे चर्चा के 9वें संस्करण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से सीधी बातचीत की। सुबह 10 बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम में दिल्ली, गुजरात के देवमोगरा, तमिलनाडु के कोयंबटूर, छत्तीसगढ़ के रायपुर और असम के गुवाहाटी से जुड़े छात्रों ने भाग लिया। कार्यक्रम का लाइव प्रसारण दूरदर्शन, पीएम मोदी के यूट्यूब चैनल और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर किया गया। इस बार 4.5 करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन होना यह दर्शाता है कि आज का छात्र केवल परीक्षा टिप्स नहीं, बल्कि जीवन मार्गदर्शन चाहता है। 🌱 सपने देखें, लेकिन एक्शन के साथ प्रधानमंत्री मोदी का संदेश बेहद स्पष्ट और प्रेरक था— “सपने न देखना जुर्म है, लेकिन सिर्फ सपनों की गुनगुनाहट से काम नहीं चलता।” उन्हों...

UPSC 2024 Topper Shakti Dubey’s Strategy: 4-Point Study Plan That Led to Success in 5th Attempt

UPSC 2024 टॉपर शक्ति दुबे की रणनीति: सफलता की चार सूत्रीय योजना से सीखें स्मार्ट तैयारी का मंत्र लेखक: Arvind Singh PK Rewa | Gynamic GK परिचय: हर साल UPSC सिविल सेवा परीक्षा लाखों युवाओं के लिए एक सपना और संघर्ष बनकर सामने आती है। लेकिन कुछ ही अभ्यर्थी इस कठिन परीक्षा को पार कर पाते हैं। 2024 की टॉपर शक्ति दुबे ने न सिर्फ परीक्षा पास की, बल्कि एक बेहद व्यावहारिक और अनुशासित दृष्टिकोण के साथ सफलता की नई मिसाल कायम की। उनका फोकस केवल घंटों की पढ़ाई पर नहीं, बल्कि रणनीतिक अध्ययन पर था। कौन हैं शक्ति दुबे? शक्ति दुबे UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2024 की टॉपर हैं। यह उनका पांचवां  प्रयास था, लेकिन इस बार उन्होंने एक स्पष्ट, सीमित और परिणामोन्मुख रणनीति अपनाई। न उन्होंने कोचिंग की दौड़ लगाई, न ही घंटों की संख्या के पीछे भागीं। बल्कि उन्होंने “टॉपर्स के इंटरव्यू” और परीक्षा पैटर्न का विश्लेषण कर अपनी तैयारी को एक फोकस्ड दिशा दी। शक्ति दुबे की UPSC तैयारी की चार मजबूत आधारशिलाएँ 1. सुबह की शुरुआत करेंट अफेयर्स से उन्होंने बताया कि सुबह उठते ही उनका पहला काम होता था – करेंट अफेयर्...

National Interest Over Permanent Friends or Foes: India’s Shifting Strategic Compass

राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि: भारत की बदलती कूटनीतिक दिशा प्रस्तावना : : न मित्र स्थायी, न शत्रु अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण बार-बार यह स्पष्ट करता है कि विश्व राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न ही कोई स्थायी शत्रु। यदि कुछ स्थायी है, तो वह है प्रत्येक राष्ट्र का राष्ट्रीय हित (National Interest) । बदलती वैश्विक परिस्थितियों में यही राष्ट्रीय हित कूटनीतिक रुख, विदेश नीति के निर्णय और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को निर्धारित करता है। वर्तमान समय में भारत की विदेश नीति इसी सिद्धांत का मूर्त रूप प्रतीत हो रही है। जहाँ एक ओर भारत और अमेरिका के बीच कुछ असहजता और मतभेद देखने को मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और चीन, सीमा विवाद और गहरी अविश्वास की खाई के बावजूद संवाद और संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ते नज़र आ रहे हैं। यह परिदृश्य एक बार फिर यह रेखांकित करता है कि भावनात्मक स्तर पर मित्रता या शत्रुता से परे जाकर, अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आधार केवल और केवल हित-आधारित यथार्थवाद है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भारत के विदेश नीति इतिहास में यह कथन अनेक बार सत्य सिद्ध हुआ ...